
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने नेशनल असेंबली में कहा कि अमेरिका ने अपने हितों के लिए पाकिस्तान का उपयोग किया और बाद में उसे नजरअंदाज कर दिया। इस बयान के बाद सियासी हलकों और सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ गई। विशेषज्ञ इसे दशकों पुराने अमेरिका-पाक सामरिक संबंधों और विदेश नीति के संदर्भ में देख रहे हैं।
- अमेरिका ने हित साधे, फिर छोड़ा: ख्वाजा आसिफ
- पाक रक्षा मंत्री के बयान से विदेश नीति पर बहस
- अमेरिका-पाक रिश्तों का इतिहास फिर चर्चा में
- संसद में उठा सामरिक साझेदारी का मुद्दा
इस्लामाबाद/नई दिल्ली। इस्लामाबाद में पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के भीतर उस समय सियासी हलचल तेज हो गई जब रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों को लेकर तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि अतीत में अमेरिका ने अपने रणनीतिक हितों की पूर्ति के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया और जब उसकी आवश्यकता समाप्त हुई तो उसे नजरअंदाज कर दिया। उनके इस बयान ने संसद से लेकर सोशल मीडिया तक बहस का नया दौर शुरू कर दिया है।
विपक्षी दलों ने इस टिप्पणी को पाकिस्तान की विदेश नीति की असफलता से जोड़ते हुए सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि यदि दशकों से यही स्थिति रही है, तो नीति-निर्माताओं को आत्ममंथन करना चाहिए। वहीं कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ख्वाजा आसिफ का बयान कोई नई बात नहीं, बल्कि अमेरिका-पाक संबंधों के ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव की स्वीकृति है। इतिहास पर नजर डालें तो शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान अमेरिका का अहम सहयोगी रहा। 1950 और 1960 के दशक में अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य और आर्थिक सहायता प्रदान की।
इसी दौरान पेशावर में अमेरिकी खुफिया गतिविधियों को अनुमति देने जैसे फैसले भी हुए, जिन्होंने दोनों देशों को सामरिक साझेदार के रूप में जोड़ा। 1979 से 1989 तक चले सोवियत-अफगान युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिका के साथ मिलकर अफगान मुजाहिदीन का समर्थन किया। इसके बदले में पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर आर्थिक और सैन्य सहायता मिली। हालांकि सोवियत संघ की वापसी के बाद दोनों देशों के संबंधों में ठंडापन देखा गया।
9/11 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में पाकिस्तान को फिर प्रमुख सहयोगी बनाया। इसके बावजूद समय-समय पर दोनों देशों के बीच अविश्वास और मतभेद उभरते रहे। ड्रोन हमलों, सीमा सुरक्षा और आतंकवाद के मुद्दों पर तनाव खुलकर सामने आता रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति उसे दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और मध्य-पूर्व के बीच एक रणनीतिक केंद्र बनाती है। यही कारण है कि वैश्विक शक्तियां अपने-अपने हितों के अनुसार पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखती हैं।
ख्वाजा आसिफ के बयान को कुछ लोग आत्मालोचन की दिशा में एक कदम मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे घरेलू राजनीति और मौजूदा सियासी दबावों से जोड़कर देख रहे हैं। स्पष्ट है कि यह टिप्पणी केवल एक बयान नहीं, बल्कि अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों के जटिल इतिहास और वर्तमान समीकरणों पर व्यापक बहस का कारण बन गई है।








