
जौनसार बावर में नौ जनवरी से पारंपरिक पौष त्यौहार और माघ मरोज लोक उत्सव का आगाज होगा, जिसकी शुरुआत हनोल के पास कयलू महाराज मंदिर में चुराच से होगी। इस लोक पर्व के दौरान किसराट, मेहमाननवाजी, लोक नृत्य और धार्मिक मान्यताओं के साथ क्षेत्र में एक माह तक उत्सव का माहौल रहेगा।
- 10 जनवरी को 11 खतों में परंपरागत किसराट पर्व का आयोजन
- एक माह तक चलेगा मेहमाननवाजी और लोक नृत्य का दौर
- बकरों की बढ़ी मांग, कीमतें 20 से 50 हजार रुपये तक
- महासू देवता और किरमिर राक्षस से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यता
त्यूणी (जौनसार बावर)। जौनसार बावर अंचल में जनवरी माह में मनाए जाने वाले पारंपरिक पौष त्यौहार और माघ मरोज लोक उत्सव का शुभारंभ इस वर्ष नौ जनवरी से होने जा रहा है। लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े इस पर्व का आगाज हनोल के समीप कयलू महाराज मंदिर में चुराच चढ़ाने की रस्म के साथ होगा। इसके अगले दिन 10 जनवरी को क्षेत्र की 11 खतों में परंपरागत तरीके से किसराट पर्व मनाया जाएगा।
जौनसार बावर की 39 खतों और 363 राजस्व गांवों से जुड़ा यह लोक उत्सव क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पूर्व टोंस नदी, जिसे तब कर्मनाशा नदी कहा जाता था, नरभक्षी किरमिर राक्षस के आतंक से त्रस्त थी। मानव कल्याण के लिए महासू देवता ने राक्षस का वध किया, जिसकी खुशी में प्रति वर्ष पौष मास की 26 गते को यह उत्सव मनाया जाता है।
चुराच और किसराट की परंपरा – कयलू महाराज मंदिर के पुरोहित मोहनलाल सेमवाल के अनुसार इस बार नौ जनवरी को चुराच मनाई जाएगी। इसके बाद 10 जनवरी को बावर खत, देवघार, शिलगांव, बाणाधार, लखौ सहित आसपास के क्षेत्रों में किसराट पर्व आयोजित होगा। लोक मान्यता के अनुसार चुराच में चढ़ाए गए बकरे के मांस का आधा हिस्सा टोंस नदी में किरमिर राक्षस के नाम पर अर्पित किया जाता है, ताकि क्षेत्र में किसी प्रकार का अनिष्ट न हो।
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मेहमाननवाजी और लोक संस्कृति – पौष पर्व पर जौनसार बावर में मेहमाननवाजी की विशेष परंपरा निभाई जाती है। घरों में सुबह पहाड़ी लाल चावल और उड़द की खिचड़ी (मशयाड़ा भात) को अखरोट, भंगजीरा और पोस्त दाने से बने मसाले के साथ घी व तिल की चटनी के साथ परोसा जाता है। रात्रि भोज में बकरे का मांस, लाल चावल और रोटी विशेष रूप से बनाई जाती है।
पंचायती आंगन लोक नृत्यों से गुलजार रहते हैं। नौकरी-पेशा लोग भी त्यौहार मनाने अपने पैतृक गांव लौटते हैं। रिश्तेदारों और संबंधियों के बीच दावतों का सिलसिला चलता है। मामा के लिए सहभोज में बकरे की जिकुड़ी (दिल) परोसने की परंपरा आज भी निभाई जाती है, जो सामाजिक रिश्तों की मजबूती का प्रतीक है।
बकरों की बढ़ती मांग –लोक उत्सव को लेकर क्षेत्र में बकरों की मांग तेज हो गई है। मवेशी पालन कम होने के कारण बकरों की कीमतें बढ़कर 20 हजार से 50 हजार रुपये तक पहुंच गई हैं। कालसी, अंबाड़ी, बाडवाला, विकासनगर और देहरादून की मंडियों से लोग बकरे खरीदने पहुंच रहे हैं। सामाजिक सौहार्द, सामूहिकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक यह पर्व आज भी संयुक्त परिवार की अवधारणा और लोक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए है।





