
सिद्धार्थ गोरखपुरी
नित नए बाजार जाइए
औकात पता चलती है
कमाना और… और… और है
अनूठी बात पता चलती है
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बाजार में दुकाने तानेबाज हैं
और पसंदीदा चीज ताना
मन कहता है…
इसे लेना है तो और कमा-ना!!!
इच्छाएं मनो-मस्तिष्क पर
सहसा चोट करती हैं
जो आदमी कर नहीं पाता
वो सबकुछ नोट करती हैं
खेल रूप का नहीं, रूपये का है
गोरा, काला, गेहूँआ मायने नहीं रखता
इज्जत उसकी न के बराबर है
जो बटुये में ज्यादा नोट नहीं रखता
आदमी सर्विलांस पर है
जबतक ऊँचा बैलेंस रहता है
रूपया जब जेब में अड़से
तो साथ सिक्स्थ सेन्स रहता है
अब न बना कोई भी सहज बहाना
खुद को उकसा कर कह
भई और… और… और कमा-ना!!!









