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‘जी राम जी’ योजना ग्रामीण भारत में रोजगार, महिला सशक्तिकरण और खाद्य सुरक्षा के माध्यम से भरोसा और उम्मीद को मजबूत करती है। यह लेख योजना की उपलब्धियों के साथ-साथ उसके दीर्घकालिक स्थायित्व, पारदर्शिता और आत्मनिर्भरता पर आवश्यक विमर्श प्रस्तुत करता है।
- ग्रामीण विकास में ‘जी राम जी’ योजना की भूमिका
- भरोसा, परिणाम और सतत क्रियान्वयन की कसौटी
- महिला सशक्तिकरण और खाद्य सुरक्षा का नया आयाम
- राजनीति में विश्वास और लोकतंत्र की मजबूती
डॉ. प्रियंका सौरभ
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भारत की राजनीति में विश्वास केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जन-धारणाओं और नीतिगत परिणामों का प्रतिफल है। ‘विकसित भारत–जी राम जी’ बिल और उससे जुड़ी योजनाएँ इस विश्वास की कसौटी पर खड़ी हैं। जब केंद्र सरकार ने यह बिल संसद में प्रस्तुत किया, तो उसके पीछे सतत विकास, सामाजिक न्याय और ग्रामीण कल्याण के विचार थे। यह बिल केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि 125 करोड़ लोगों तक पहुँचने वाली योजनाओं का प्रतीक है। वर्तमान सरकार का दृष्टिकोण स्पष्ट है—विकास को केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा जाए। इसके लिए योजना का कायमी प्रभाव और पारदर्शी क्रियान्वयन आवश्यक है। इसके तहत ग्रामीण रोजगार, खाद्यान्न वितरण, महिला सशक्तिकरण और न्यूनतम आय सुरक्षा जैसी नीतियाँ लागू की गई हैं। इन नीतियों के परिणामस्वरूप ग्रामीण और वंचित वर्ग में भरोसा और उम्मीद दोनों बढ़ी हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था हमेशा असुरक्षित रही है। कृषि पर आधारित जीवनशैली, सीमित औद्योगिक विकास और मौसमी रोजगार की अस्थिरता ने ग्रामीणों को अस्थायी रोजगार और पलायन की ओर मजबूर किया। इस संदर्भ में केंद्र सरकार की ग्रामीण रोजगार योजना एक जागरूक प्रयास है। यह योजना न केवल रोजगार उपलब्ध कराती है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय निर्माण और उत्पादन गतिविधियों को भी बढ़ावा देती है। महिलाओं की भागीदारी, युवा शक्ति का नियोजन और स्थानीय संसाधनों का उपयोग योजना को स्थायी और प्रभावी बनाता है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि ग्रामीण आर्थिक सुरक्षा महसूस करें और पलायन कम हो।
महिलाओं का भाग्य सुधारना केवल सामाजिक न्याय का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक विकास और सामुदायिक स्थिरता का भी संकेत है। ‘जी राम जी’ योजना के तहत महिलाओं को रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर दिए गए हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है—महिलाओं ने अपने परिवार की आय में योगदान बढ़ाया, स्थानीय उत्पादकता में हिस्सेदारी ली और अपने समाज में निर्णय लेने की क्षमता विकसित की। महिला सशक्तिकरण का यह आयाम योजना की दीर्घकालिक सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जब महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है, तो परिवार के स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के मानक भी सुधरते हैं। इस तरह योजना केवल आर्थिक सुधार तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की नींव भी तैयार करती है।
भारत में खाद्य सुरक्षा हमेशा सामाजिक राजनीति का केंद्र रही है। गरीब और वंचित वर्ग को आवश्यक खाद्यान्न और न्यूनतम आय सुरक्षा प्रदान करना केवल दान या राहत नहीं, बल्कि न्याय और संवैधानिक जिम्मेदारी है। जी राम जी बिल ने इस दिशा में ठोस कदम बढ़ाए हैं। 125 करोड़ लाभार्थियों तक पहुँचने वाली योजना का प्रत्यक्ष परिणाम यह है कि भोजन और आय का भरोसा पैदा हुआ है। गरीब वर्ग अब केवल दिन-प्रतिदिन के संघर्ष में नहीं फँसा है, बल्कि भविष्य की योजनाओं में भागीदारी और उम्मीद महसूस करता है। यह भरोसा सरकार और जनता के बीच संबंध की मजबूती का परिचायक है। सभी नीतियों में आलोचना होना स्वाभाविक है। विपक्ष ने सवाल उठाए हैं कि क्या यह योजना दीर्घकालिक आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए पर्याप्त है, क्या यह केवल अस्थायी राहत है और क्या इसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित है।
इन सवालों का महत्व है। विकास केवल तात्कालिक परिणामों से नहीं मापा जा सकता। इसे स्थायित्व, निगरानी और समयबद्ध सुधार के साथ देखा जाना चाहिए। आलोचना यह भी याद दिलाती है कि राजनीतिक विश्वास स्थायी तभी बनता है जब योजना के परिणाम लगातार दिखाई दें और जनता के अनुभव से मेल खाते हों। राजनीतिक विश्वास केवल चुनावी रैलियों या भाषणों से नहीं बनता। यह तब मजबूत होता है जब जनता नतीजे देखे, अनुभव करे और महसूस करे। ‘जी राम जी’ योजना इस दृष्टि से अनूठी है। यह दिखाती है कि यदि सरकार व्यवस्था, नीति और क्रियान्वयन को संतुलित रखे, तो जनता का भरोसा बढ़ सकता है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि सरकार सतत निगरानी और सुधार करती रहे। योजना की प्रभावशीलता तभी बनी रहती है जब स्थानीय प्रशासन, पंचायत और लाभार्थियों के बीच संवाद और जवाबदेही हो। यही लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी ताकत है।
भरोसे और नीतियों की कसौटी पर ‘जी राम जी’ बिल ने एक नई मिसाल कायम की है। भविष्य में इसके और भी सफल होने के लिए स्थायित्व और विस्तार, पारदर्शिता, स्थानीय उद्योग और उत्पादन, महिला व युवा सशक्तिकरण तथा अर्थव्यवस्था और विकास के संतुलन पर निरंतर ध्यान आवश्यक है। ‘जी राम जी’ बिल और उससे जुड़ी योजनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि भरोसा और परिणाम राजनीति के दो महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। केवल घोषणाओं या भाषणों से जनता का विश्वास नहीं बनता, बल्कि इसे क्रियान्वयन, पारदर्शिता और परिणामों के साथ जोड़ना आवश्यक है। संक्षेप में, भरोसा केवल राजनीति का जरिया नहीं, बल्कि विकास और सामाजिक न्याय की दिशा में एक स्थायी स्तंभ बन सकता है। ‘जी राम जी’ बिल इस कसौटी पर खड़ा होता दिख रहा है और यदि इसे सुधार व सतत निगरानी के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो यह भारत के ग्रामीण विकास और लोकतांत्रिक विश्वास का आदर्श मॉडल बन सकता है।
डॉ. प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पॉलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)







