
सुनील कुमार माथुर
हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहलाता है, लेकिन विडंबना यह है कि यही लोकतंत्र अक्सर जनता के बुनियादी अधिकारों और आवश्यकताओं की अनदेखी का कारण बन जाता है। सरकारी दफ्तरों में जनता के कार्यों में जिस प्रकार लगातार विलंब होता है, वह लोकतंत्र की आत्मा के बिल्कुल विपरीत है। नियम-कायदों की आड़ में सरकारी कर्मचारी किसी भी कार्य को टालने में देर नहीं लगाते। परिणामस्वरूप आम नागरिक अपने ही अधिकारों को पाने के लिए वर्षों चक्कर काटने को मजबूर हो जाता है।
जब कोई व्यक्ति किसी समस्या का समाधान कराने के लिए किसी सरकारी विभाग में शिकायत दर्ज कराता है या किसी जनप्रतिनिधि को पत्र लिखता है, तो सामान्यतः एक औपचारिक नोट लगा दिया जाता है कि “नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही की जाए।” कई बार तो शिकायत को संबंधित विभाग के नाम पर आगे बढ़ा दिया जाता है और कहा जाता है कि प्रार्थना पत्र मूल रूप से उसी विभाग से संबंधित है, इसलिए नियमानुसार कार्रवाई वही करेगा। परंतु यह ‘नियमानुसार’ शब्द स्वयं एक बड़ा प्रश्न है। ये नियम कौन से हैं, इनके तहत किस प्रकार की कार्रवाई होनी चाहिए, कब तक होनी चाहिए—यह कोई स्पष्ट नहीं करता। विभाग केवल पत्रों को एक-दूसरे के बीच लोटा-फेरी करते हैं। समस्या वहीं की वहीं बनी रहती है, जबकि जनता समाधान की उम्मीद लेकर बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाती है।
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वास्तविक स्थिति यह है कि शिकायत का निस्तारण करने की जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी की होती है। यदि किसी समस्या पर निर्णय लेना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, तो वे अपने उच्च अधिकारियों से मार्गदर्शन लेकर समाधान खोज सकते हैं। लेकिन ऐसा होता नहीं। लालफीताशाही की जकड़न में फंसा आम नागरिक हताश और निराश हो जाता है। कई बार उसे लगता है कि शायद उसकी समस्या का समाधान कभी संभव ही नहीं।
जनप्रतिनिधियों का रवैया भी इससे अलग नहीं है। विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और यहां तक कि प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को भेजे गए पत्रों के उत्तर तक प्राप्त नहीं होते। शिकायत दर्ज होने की साधारण सूचना देने की भी औपचारिकता नहीं निभाई जाती। और यदि कभी कोई जवाब आता भी है तो वही रटा-रटाया वाक्य—“आपका पत्र संबंधित विभाग को नियमानुसार कार्यवाही हेतु प्रेषित कर दिया गया है।” इसके आगे कुछ नहीं। समस्या वहीं अटकी रहती है और जनता अपनी ही पीड़ा से जूझती रहती है।
सरकारी नियम-कायदों का ढांचा इस प्रकार बनाया गया है कि उसमें कार्य करने से अधिक कार्य को टालने का मार्ग अधिक सुलभ है। यही कारण है कि दफ्तरों में शिकायतों और लंबित मामलों का अम्बार लगता जाता है। जनता की उम्मीदें टूटती हैं और यह प्रश्न बार-बार उठता है कि आखिर जनता की समस्याओं का समाधान कौन करेगा? सत्ताधारी दल हों या विपक्ष—सभी चुनावों के दौरान जनता के चरणों में दिखाई देते हैं, लेकिन सत्ता मिलने के बाद जनहित गौण हो जाता है और स्वार्थ प्रमुख।
सरकारें वाहवाही लूटने, घोषणाएँ करने और प्रचार में व्यस्त रहती हैं, जबकि जनता की पीड़ा, उसकी फाइलों में दबी जिंदगियाँ और उसके अधिकारों की लड़ाई अनसुनी रह जाती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि नियमों को सरल बनाया जाए, जवाबदेही तय की जाए, और हर सरकारी कार्यालय में काम की समयसीमा सुनिश्चित की जाए। लोकतंत्र तभी सार्थक होगा, जब जनता के कार्य समय पर हों और उसकी समस्याओं का ठोस समाधान मिल सके।
लेखक:
सुनील कुमार माथुर
अणुव्रत लेखक मंच
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
जोधपुर, राजस्थान








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