
यह आलेख आधुनिक प्रेम को वेलेंटाइन सप्ताह की घटनाओं के माध्यम से आत्मसम्मान, टूटन और आत्मबोध की यात्रा के रूप में प्रस्तुत करता है। प्रेम के उत्सव से लेकर ब्रेकअप और अंततः स्वयं से प्रेम तक की यह कथा भावनात्मक परिपक्वता और आत्मसंरक्षण का संदेश देती है।
- तारीख़ों में बँधा प्रेम और भीतर की कहानी
- वेलेंटाइन सप्ताह से आत्मसम्मान तक की यात्रा
- रिश्तों की ख़ामोशी और टूटन का मनोविज्ञान
- जब प्रेम किसी और से नहीं, खुद से होता है
रूपेश कुमार
युवा लेखक / छात्र, चैनपुर, सीवान, बिहार
इश्क़ किसी एक दिन का उत्सव नहीं होता, लेकिन आधुनिक समय ने उसे कैलेंडर के पन्नों में बाँध दिया है। गुलाब डे से लेकर वेलेंटाइन तक और फिर ब्रेकअप डे तक प्रेम अब तारीख़ों में गिना जाने लगा है। पर इन तारीख़ों के बीच जो घटता है, वही असली कहानी होती है। यह कहानी प्रेम की है, पर उससे भी ज़्यादा आत्मसम्मान की। इश्क़ का मौसम गुलाब डे से शुरू होता है। हाथ में एक फूल होता है थोड़ा काँपता हुआ, थोड़ा असहज। सामने एक मुस्कान होती है, जो भीतर छिपे डर को भी कुछ देर के लिए सुंदर बना देती है। उस पल एहसास होता है कि प्रेम साहस माँगता है, और साहस डर की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि डर के साथ आगे बढ़ने का नाम है।
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प्रपोज डे पर शब्द अक्सर साथ छोड़ देते हैं। अल्फ़ाज़ मन में बहुत होते हैं, लेकिन ज़ुबान तक आते-आते ठिठक जाते हैं। दिल फिर भी कोशिश करता है। डर को साथ लेकर किसी से अपना होने की इच्छा रखना शायद प्रेम की सबसे सच्ची परिभाषा है। चॉकलेट डे पर मिठास सिर्फ़ स्वाद तक सीमित नहीं रहती। असली मिठास उस साधारण से आग्रह में होती है “पास बैठो।” यह आग्रह किसी भी रिश्ते की नींव होता है, जहाँ साथ होने की अनुभूति जीवन की तमाम कड़वाहटों को कुछ देर के लिए भुला देती है। टेडी डे पर बाहों का सहारा मिलता है।
यह स्वीकार होता है कि मज़बूत दिखने वाले लोग भी रातों में किसी अपने की तलाश करते हैं। किसी ऐसे की, जो बिना सवाल पूछे साथ दे सके। प्रेम का यही रूप सबसे मानवीय होता है। प्रॉमिस डे पर बड़े-बड़े वादे नहीं किए जाते। बस एक ख़ामोश समझ बनती है कि सच बोला जाएगा। भले ही वह सच कभी-कभी रिश्ते के सीने में चुभ जाए। क्योंकि प्रेम में झूठ से ज़्यादा घातक कुछ नहीं होता। चुम्बन डे पर शब्द अप्रासंगिक हो जाते हैं। होंठ मिलते हैं, साँसें थम जाती हैं और दो आत्माएँ एक-दूसरे को भीतर तक पहचानने लगती हैं। इसके बाद आता है आलिंगन जहाँ महसूस होता है कि सुकून किसी जगह का नाम नहीं, बल्कि किसी इंसान का होना है। वहीं यह एहसास भी जन्म लेता है कि “घर” हमेशा दीवारों से नहीं बनता।
वेलेंटाइन डे पर लगता है कि प्रेम सुरक्षित है। पूरा शहर जश्न में डूबा होता है। लाल रंग, रोशनी और मुस्कानें भविष्य को आसान दिखाने लगती हैं। लेकिन प्रेम हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलता। अक्सर यहीं से उसका सबसे कठिन दौर शुरू होता है। फिर आती है ख़ामोशी एक ऐसा थप्पड़, जो हाथ से नहीं, अहसास से लगता है। यह सीधा आत्मसम्मान पर पड़ता है। सवाल पूछे नहीं जाते, जवाब दिए नहीं जाते। रिश्ते में दूरी धीरे-धीरे जगह बनाने लगती है। किक डे रिश्ते को बिना शोर किए दरवाज़े तक छोड़ आता है। कोई स्पष्ट विदाई नहीं होती, बस धीरे-धीरे बाहर कर दिया जाता है।
इत्र दिवस पर यादों पर खुशबू बिखेरी जाती है, लेकिन वह खुशबू कमरे तक सिमट कर रह जाती है। इंसान ज़िंदगी से उतर जाता है, उसकी महक अँधेरे में भटकती रहती है। फ़्लर्टिंग डे पर नक़ाब ओढ़ी हँसी दिखाई देती है। यह हँसी दूसरों के लिए होती है, खुद के लिए नहीं। आँखों में एक खालीपन छिपा होता है, ताकि कोई कमी न पढ़ सके। कन्फ़ेशन डे पर सबसे बड़ा झूठ बोला जाता है “मैं ठीक हूँ।” लापता दिवस सच्चाई को उजागर कर देता है। वह व्यक्ति हर जगह मौजूद होता है गीतों में, सड़कों पर, यादों में बस साथ नहीं होता। ब्रेकअप डे पर तारीख़ तो मिल जाती है, लेकिन प्रेम को कोई अंतिम शब्द नहीं मिलता। कुछ रिश्ते बिना पूर्ण विराम के ही खत्म हो जाते हैं।
और फिर एक दिन आता है बिना नाम, बिना तारीख़। उसी दिन प्रेम दोबारा जन्म लेता है। इस बार किसी और के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए। यह प्रेम फूलों और वादों का मोहताज नहीं होता। यह अपने अस्तित्व, अपनी सीमाओं और अपने आत्मसम्मान के लिए होता है। यहीं समझ आता है कि सच्चा इश्क़ कभी मरता नहीं। वह बस दर्द की गलियों से होकर गुजरता है। टूटता है, बिखरता है, लेकिन हर बार पहले से ज़्यादा रौशन होकर लौटता है। क्योंकि अंततः प्रेम की सबसे परिपक्व अवस्था किसी और को पाने में नहीं, बल्कि खुद को बचा पाने में होती है।








