तुझको चांंद बनाया मैंने

राजेश ध्यानी “सागर”
लगता हैं अब समय
आ गया ,
तुझसें दूर जाने का ।
कब तक तेरी राह निहांरु ,
छलना तेरा काम रहा ।
तुझकों चांंद बनाया मैंने
तूने पत्थर बना दिया ।
रात हुई चांदनी ने तेरी
शीतलता में सुला दिया ।
सुबह की जब वेंला आयीं
पत्थर ढूंढें शीतलता
नजर पड़ी सूरज की उस पर
मुझकों तपता कर दिया ।
मैं बोलू सूरज ज़ालिम
मैंने ऐसा क्या ।
मैं तो एक जगह बेंठा हूं ,
उसकी राह निहांर रहा
क्यूँ सितम ढ़ाये तू मुझ पर
तेरी तप से जल गया ।
ऐ बादल तू थोंड़ा ढ़क दें
तन मन हें जल रहा
उस चांदनी से कहना तू
तूने ऐंसा कंयू किया.
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¤ प्रकाशन परिचय ¤
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From »राजेश ध्यानी “सागर”वरिष्ठ पत्रकार, कवि एवं लेखकAddress »144, लूनिया मोहल्ला, देहरादून (उत्तराखण्ड) | सचलभाष एवं व्हाट्सअप : 9837734449Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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