
भारत का प्रमुख पर्व होली आस्था, पौराणिक परंपराओं, सामाजिक समरसता और वसंत ऋतु के उल्लास का प्रतीक है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय, प्रेम, प्रकृति परिवर्तन और मानवीय एकता का संदेश देता है। सतयुग से आधुनिक काल तक होली का सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व बना हुआ है।
- होली का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व
- रंगों का पर्व: परंपरा, इतिहास और विज्ञान
- सतयुग से आधुनिक काल तक होली की यात्रा
- होली: सामाजिक समरसता और प्रेम का उत्सव
सत्येंद्र कुमार पाठक
भारत अपनी विविधता और त्योहारों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है, जिनमें होली का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मात्र रंगों का खेल नहीं, बल्कि प्राचीन परंपराओं, पौराणिक कथाओं और प्रकृति के बदलाव का एक अद्भुत मेल है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ और ‘आपसी प्रेम’ का द्योतक है। होली का सबसे प्रमुख आधार भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा है। यह कहानी हमें सिखाती है कि सत्ता और अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, ईश्वर के प्रति सच्ची भक्ति के सामने वह टिक नहीं सकता।
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हिरण्यकश्यप के षड्यंत्र को विफल कर जब प्रह्लाद आग से सुरक्षित निकले और होलिका भस्म हुई, तभी से होलिका दहन की परंपरा चली आ रही है, जो हमारे भीतर की नकारात्मकता को जलाने का प्रारंभ है। पौराणिक कथाओं से इतर, होली का सामाजिक और भावनात्मक स्वरूप राधा-कृष्ण के प्रेम से जुड़ा है। कान्हा का राधा पर रंग डालना और ब्रज की गलियों में होने वाली ठिठोली आज भी ‘लठमार होली’ और ‘सांस्कृतिक गीतों’ के रूप में जीवित है। यह हिस्सा होली को कठोर नियमों से मुक्त कर एक सहज और निश्छल त्योहार बनाता है।
कामदेव का पुनर्जन्म: भगवान शिव द्वारा कामदेव को भस्म करने और फिर रति की प्रार्थना पर उन्हें पुनर्जीवित करने की खुशी में भी यह उत्सव मनाया जाता है।
ढुंढी का अंत: राजा पृथु के काल में बच्चों को परेशान करने वाली ढुंढी राक्षसी को भगाने के लिए किए गए शोरगुल ने आज की होली के हुड़दंग और उल्लास को जन्म दिया।
किसान अपनी नई फसल का अंश अग्नि देवता को समर्पित कर अपनी समृद्धि का आभार प्रकट करते हैं। इतिहास के पन्नों से लेकर आज के आधुनिक युग तक, होली का मूल तत्व ‘सद्भावना’ रहा है। इस दिन लोग ऊंच-नीच, जाति-पाति और पुराने मनमुटाव को भुलाकर एक-दूसरे को गुलाल लगाते हैं। यह त्योहार हमें यह सिखाता है कि जीवन में रंगों की तरह विविधता है।
सतयुग — प्रह्लाद और होलिका: यह होली का ‘स्थापना काल’ माना जाता है। यहाँ से अग्नि पूजा और बुराई के विनाश (होलिका दहन) की परंपरा शुरू हुई।
त्रेतायुग — श्रीराम का काल: इस युग में इसे ‘वसंतोत्सव’ के रूप में मनाया जाता था। ऋषि-मुनि और राजा प्रकृति के परिवर्तन का स्वागत यज्ञ और पुष्पों से करते थे।
द्वापरयुग — राधा-कृष्ण की लीला: यह होली का ‘रंगोत्सव काल’ है। भगवान कृष्ण ने इसे रंगों, गुलाल और गोपियों के साथ होली खेलकर एक सामाजिक उत्सव का रूप दिया।
कलियुग — भक्ति और परंपरा: वर्तमान युग में यह भक्ति, मनोरंजन और सामाजिक समरसता का त्योहार बन गया है, जहाँ शास्त्रीय संगीत और लोकगीत (फाग) प्रमुख हैं।
मुगल काल (1526–1857) में मुगल शासकों के समय होली को ‘ईद-ए-गुलाबी’ या ‘आब-ए-पाशी’ (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अकबर और जहाँगीर हिंदू त्योहारों में रुचि लेते थे और महल में भव्य होली का आयोजन होता था। शाहजहाँ के समय में इसे ‘जश्न-ए-होली’ कहा जाता था। बहादुर शाह जफर स्वयं होली पर आधारित कविताएँ और गीत (होरी) लिखते थे। ब्रिटिश काल (1858–1947) में अंग्रेजों के शासन के दौरान होली का स्वरूप थोड़ा बदला। ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे ‘दंगे जैसा’ मानकर कई बार प्रतिबंधित करने की कोशिश की, लेकिन भारतीयों ने इसे अपनी सांस्कृतिक एकता का हथियार बनाया। इसी काल में ब्रज की होली ने वैश्विक पहचान बनानी शुरू की।
होली का सबसे प्राचीन उल्लेख वेदों और पुराणों (नारद पुराण, भविष्य पुराण) में मिलता है। जैमिनी सूत्र और साबर भाष्य जैसे प्राचीन ग्रंथों में ‘होलाका’ शब्द का वर्णन है। पुरातात्विक दृष्टि से विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ में मिले 300 ईसा पूर्व के अभिलेखों में भी वसंतोत्सव का उल्लेख है। आज होली भारत की सीमाओं को पार कर वैश्विक हो चुकी है। सूरीनाम, गुयाना और फिजी में भारतीय मूल के लोग ‘चौताल’ गाकर पारंपरिक तरीके से होली मनाते हैं। नेपाल में इसे ‘फागु पुन्ही’ कहा जाता है। पश्चिमी देशों में ‘कलर रन’ और ‘होली वन’ जैसे उत्सव लोकप्रिय हैं। थाईलैंड का ‘सोंगक्रान’ त्योहार भी रंग और जल उत्सव का प्रतीक है।
होली केवल रंग नहीं, एक ब्रह्मांडीय चेतना है। यह वसंत ऋतु के आगमन की घोषणा और सामाजिक बंधनों के नवीनीकरण का पर्व है। फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक चलने वाला यह उत्सव ऊर्जा के नवीनीकरण का प्रतीक है। भारतीय राष्ट्रीय कैलेंडर ‘शक संवत’ और ‘विक्रम संवत’ दोनों के लिए होली एक निर्णायक बिंदु है। विक्रम संवत के अनुसार यह वर्ष का अंतिम दिन है, जबकि शक संवत की गणना के अनुसार यह वसंत विषुव के निकट होता है।
स्वतंत्र भारत में होली लोकतांत्रिक उत्सव के रूप में विकसित हुई। राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में इसे मनाया जाता है। ‘महामूर्ख सम्मेलन’ जैसी आधुनिक परंपराएँ सरलता और निश्छलता का संदेश देती हैं। होली केवल भावुकता नहीं, बल्कि विज्ञान भी है। ऋतु परिवर्तन के समय शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। रबी की फसल पकने की खुशी किसानों के लिए इसे आर्थिक उत्सव बनाती है। होली हमें सिखाती है कि जीवन एक रंगमंच है जहाँ बुराई को जलना और भक्ति को बचना ही होगा। यह त्योहार आपसी प्रेम, हास्य और क्षमा का संदेश देता है।
होली का असली संदेश है—”अतीत की राख को पीछे छोड़ो और भविष्य के रंगों में सराबोर हो जाओ।”








