
यह आलेख हिंदी और नेपाली साहित्य में निहित प्रेम, माया, करुणा और सद्भावना की साझा परंपरा को रेखांकित करता है। भानुभक्त आचार्य, लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकारों की रचनाओं के माध्यम से भारत-नेपाल की सांस्कृतिक आत्मीयता को अभिव्यक्ति मिली है। यह साहित्य सीमाओं से परे मानवीय एकता और विश्व-बंधुत्व का संदेश देता है।
- भक्ति परंपरा में भारत-नेपाल की सांस्कृतिक एकता
- ‘माया’ और ‘प्रेम’ की साझा संवेदना
- बुद्ध, गांधी और मानवता का साहित्यिक स्वर
- लोकगीतों से ग़ज़लों तक साहित्यिक समन्वय
सत्येन्द्र कुमार पाठक
करपी, अरवल, बिहार
भारत और नेपाल के संबंध केवल दो राजनीतिक सीमाओं के मिलन बिंदु नहीं हैं, बल्कि यह दो ऐसी संस्कृतियों का संगम है, जिनका हृदय एक ही लय में धड़कता है। हिमालय की कंदराओं से निकलने वाली नदियाँ जिस प्रकार भारत के मैदानों को सींचती हैं, उसी प्रकार इन दोनों देशों का साहित्य ‘प्रेम’ और ‘सद्भावना’ के जल से एक-दूसरे की वैचारिक भूमि को उर्वर बनाता रहा है। हिंदी और नेपाली साहित्य में निहित भक्ति, करुणा और भातृत्व वह अदृश्य धागा है, जो पशुपतिनाथ को काशी विश्वनाथ से और लुंबिनी को बोधगया से जोड़ता है।
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भक्ति साहित्य: प्रेम का आध्यात्मिक शिखर
हिंदी और नेपाली दोनों ही साहित्यों का स्वर्ण युग ‘भक्ति काल’ रहा है। यहाँ प्रेम केवल व्यक्तिगत राग नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और चराचर जगत के प्रति ‘ममता’ (माया) है।
राम काव्य की मर्यादा: जहाँ भारत में गोस्वामी तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम को घर-घर पहुँचाया, वहीं नेपाल में आदिकवि भानुभक्त आचार्य ने ‘भानुभक्त रामायण’ लिखकर नेपाली जनमानस को एक नई भाषाई और सांस्कृतिक पहचान दी। दोनों कवियों के लिए राम ‘प्रेम और न्याय’ के प्रतीक हैं।
कृष्ण प्रेम की माधुरी: हिंदी में सूरदास और रसखान की कृष्ण भक्ति जिस तन्मयता से मिलती है, नेपाली साहित्य में भी कृष्ण काव्य की वही धारा प्रवाहित हुई है। यहाँ ‘प्रेम’ ईश्वर की प्राप्ति का एकमात्र साधन माना गया है, जिसमें कोई ऊँच-नीच या सीमा नहीं है।
‘प्रेम’ और ‘माया’: नेपाली संवेदना के दो रंग
नेपाली साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए दो शब्दों का प्रयोग अत्यंत सुंदर और अर्थपूर्ण है— ‘प्रेम’ और ‘माया’।
प्रेम: यह शब्द अक्सर शास्त्रीय, गंभीर और आध्यात्मिक अनुराग के लिए प्रयुक्त होता है।
माया: हिंदी में ‘माया’ का अर्थ प्रायः भ्रम या संसार की असत्यता से लिया जाता है, किंतु नेपाली साहित्य और लोकजीवन में ‘माया’ का अर्थ अत्यंत पवित्र है। यहाँ ‘माया’ का अर्थ है— स्नेह, ममता, दया और लगाव। जब एक नेपाली कवि ‘माया’ की बात करता है, तो वह उस आत्मीयता को दर्शाता है, जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से जोड़ती है। यही वह मानवीय संवेदना है, जो भारत-नेपाल के साझा रिश्तों का आधार है।
करुणा का बुद्धत्व: मानवतावाद का स्वर
नेपाली साहित्य में बुद्ध की करुणा और हिंदी साहित्य में गांधी की अहिंसा का गहरा प्रभाव है। महाकवि लक्ष्मीप्रसाद देवकोटा (नेपाल) और जयशंकर प्रसाद (भारत) जैसे दिग्गजों ने अपने काव्य में ‘मानवता’ को ही सबसे बड़ा धर्म माना। देवकोटा की कालजयी रचना ‘मुनामदन’ प्रेम और विरह की वह महागाथा है, जो जाति और वर्ग की सीमाओं को तोड़कर ‘मानवीय हृदय’ की श्रेष्ठता सिद्ध करती है। हिंदी में ‘कामायनी’ जिस प्रकार मानवता के विकास की कथा कहती है, नेपाली काव्य भी उसी प्रकार शांति और विश्व-बंधुत्व का संदेश देता है। ‘बुद्ध’ दोनों देशों के साझा नायक हैं, जिनके माध्यम से करुणा और सद्भावना के स्वर मुखरित होते हैं।
हिंदी: नेपाल के मधेस और पहाड़ों के बीच का सेतु
नेपाल में हिंदी भाषा केवल एक विदेशी भाषा नहीं है, बल्कि यह संपर्क, शिक्षा और संस्कृति की भाषा रही है।
मधेस क्षेत्र: नेपाल का तराई क्षेत्र हिंदी, मैथिली और भोजपुरी के माध्यम से भारत से सीधे तौर पर जुड़ा है। यहाँ का साहित्य साझा रोटी-बेटी के संबंधों और सांस्कृतिक एकता का जीवंत दस्तावेज है। देवनागरी लिपि ने दोनों भाषाओं के बीच एक ‘भाषिक पुल’ का कार्य किया है। नेपाल के आधुनिक गद्य लेखन और शिक्षा के विकास में हिंदी साहित्य के महान रचनाकारों (जैसे प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और फणीश्वर नाथ रेणु) का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।
साहित्य समाज का दर्पण होता है। जहाँ इतिहास युद्धों और विजयों की बात करता है, वहीं साहित्य उन युद्धों से पीड़ित मानवता के घावों पर ‘प्रेम’ का मरहम लगाता है। नेपाली साहित्य में गुमानी पंत जैसे कवियों ने राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी प्रेम और सद्भावना को प्रमुखता दी। उन्होंने दिखाया कि विनाश और युद्ध के बजाय जीवन को ‘प्रेम’ से ही सुंदर बनाया जा सकता है। हिंदी के छायावादी और प्रगतिवादी कवियों की तरह नेपाली कवियों ने भी शोषितों के प्रति ‘करुणा’ और अत्याचारी के विरुद्ध ‘प्रेमपूर्ण प्रतिरोध’ का मार्ग चुना।
लोक संस्कृति: गीतों में बहती साझा विरासत
साहित्य केवल पोथियों में नहीं, बल्कि लोकगीतों में भी जीवित रहता है। नेपाली के ‘बारहमासा’, ‘प्रेमगीत’ और ‘वीरगीत’ हिंदी के लोक साहित्य (जैसे कजरी, चैती और सोहर) के बहुत करीब हैं। प्रकृति चित्रण में हिमालय का वर्णन दोनों साहित्यों में एक समान गौरव के साथ आता है। पहाड़ की सुंदरता, नदियों का कल-कल और ग्रामीण जीवन की सरलता— ये तत्व दोनों साहित्यों को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा कर देते हैं।
आज के दौर में नेपाल में ग़ज़ल विधा का जबरदस्त उभार हुआ है। हिंदी और उर्दू की ग़ज़ल परंपरा ने नेपाली युवाओं को इस कदर प्रभावित किया है कि आज नेपाली में लिखी जा रही ग़ज़लें ‘प्रेम और कोमलता’ का नया मानक गढ़ रही हैं। समकालीन नेपाली और हिंदी लेखक साझा कार्यशालाओं और साहित्यिक सम्मेलनों के माध्यम से ‘भारत-नेपाल भाई-भाई’ की भावना को और प्रगाढ़ कर रहे हैं। मन्नू भंडारी की ‘यही सच है’ जैसी कहानियों में प्रेम की जो सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक परतें हैं, वैसी ही संवेदनशीलता आधुनिक नेपाली कथा-साहित्य में भी दृष्टिगोचर होती है।
हिंदी और नेपाली साहित्य की यह समरूपता केवल शब्दों का मेल नहीं है, बल्कि यह उन साझा मूल्यों का प्रतीक है, जिन्हें हमने सदियों से सहेजकर रखा है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (विश्व एक परिवार है) की भावना दोनों देशों के साहित्य की आत्मा है। जब तक नेपाल के पहाड़ों में ‘माया’ के गीत गाए जाते रहेंगे और भारत की गलियों में ‘प्रेम’ की चर्चा होती रहेगी, तब तक यह सांस्कृतिक सेतु अडिग रहेगा। साहित्य वह प्रकाश है, जो नफरत के अंधकार को मिटाकर प्रेम और सद्भावना का मार्ग प्रशस्त करता है। भारत और नेपाल का साहित्यिक संबंध इसी स्थायी प्रेम और अटूट भाईचारे का घोषणापत्र है।
“साहित्य समाज का वह दर्पण है, जिसमें दो देश अपनी सीमाओं को भूलकर एक-दूसरे के हृदय की धड़कन सुन सकते हैं।”






