
हाजीपुर की दवा कंपनी ट्रिडस रेमेडीज द्वारा निर्मित बच्चों के कफ सिरप में एथिलीन ग्लाइकोल जैसे घातक रसायन की पुष्टि हुई है। जांच के बाद कई राज्यों में दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड में है।
- अल्मोंट-किड सिरप की जांच में फेल हुई गुणवत्ता
- तेलंगाना व हिमाचल में दवा की बिक्री पर रोक
- खतरनाक रसायन मिलने के बाद दवा कंपनी पर कार्रवाई की तैयारी
- बिहार के किशनगंज में सीमित मात्रा में हुई थी सप्लाई
वैशाली (बिहार)। बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ी एक बेहद गंभीर लापरवाही सामने आई है। वैशाली जिले के हाजीपुर औद्योगिक क्षेत्र में स्थित दवा निर्माता कंपनी ट्रिडस रेमेडीज द्वारा तैयार किए गए बच्चों के कफ सिरप में एथिलीन ग्लाइकोल जैसे अत्यंत विषैले रसायन की मौजूदगी पाई गई है। इस खुलासे के बाद तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश समेत कई राज्यों में दवा की बिक्री, वितरण और उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। जानकारी के अनुसार, केंद्रीय ड्रग इंस्पेक्टर ने अक्तूबर माह में ट्रिडस रेमेडीज में निर्मित अल्मोंट-किड सिरप का सैंपल लिया था।
हाल ही में आई जांच रिपोर्ट में यह सिरप गुणवत्ता परीक्षण में फेल पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार, दवा के एक विशेष बैच (AL-24002) में एथिलीन ग्लाइकोल की मात्रा 1.4876 प्रतिशत पाई गई, जिसे विशेषज्ञों ने बच्चों के लिए बेहद खतरनाक बताया है। एथिलीन ग्लाइकोल एक घातक रसायन है, जिसका सेवन किडनी फेल्योर, तंत्रिका तंत्र को नुकसान और यहां तक कि मृत्यु तक का कारण बन सकता है। यह सिरप बच्चों में एलर्जी, नाक बहना, छींक, खुजली, आंखों से पानी आना जैसी समस्याओं के इलाज के लिए उपयोग में लाया जा रहा था।
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प्रतिबंध के बाद जब स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की टीम ने कंपनी परिसर का निरीक्षण किया तो फैक्टरी का गेट बंद मिला। स्थानीय लोगों के अनुसार, कंपनी कई दिनों से बंद है। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों का कहना है कि कंपनी के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि इस दवा की सप्लाई बिहार में केवल किशनगंज जिले में सीमित मात्रा में हुई थी। केंद्रीय औषधि नियंत्रण विभाग के निर्देश पर सभी राज्यों को संबंधित बैच की दवाएं तत्काल बाजार से वापस मंगाने और कार्रवाई करने के आदेश दिए गए हैं।
गौरतलब है कि इससे पहले भी देश में सिरप में एथिलीन ग्लाइकोल मिलने से कई बच्चों की मौत के मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में यह मामला एक बार फिर दवा निर्माण और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।








