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हल्द्वानी रेलवे भूमि विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि 10 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई होने वाली है, जिस पर हजारों निवासियों का भविष्य निर्भर है। बनभूलपुरा क्षेत्र में दशकों से बसे लोगों और याचिकाकर्ताओं के बीच उम्मीदों और आशंकाओं का दौर जारी है।
- बनभूलपुरा फिर चर्चा में, रेलवे जमीन विवाद पर तनाव और उम्मीदें
- सुप्रीम कोर्ट में 10 दिसंबर को सुनवाई, हजारों लोगों की किस्मत दांव पर
- हल्द्वानी भूमि प्रकरण में दोनों पक्षों की दलीलें तेज, अंतिम फैसले की उलटी गिनती
- क्या हटेगा अतिक्रमण या मिलेगा राहत? कोर्ट के फैसले पर टिकी निगाहें
हल्द्वानी | हल्द्वानी रेलवे भूमि विवाद पूरे प्रदेश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। बनभूलपुरा क्षेत्र, जिसे बीते दो दशकों से अतिक्रमण और विस्थापन से जुड़े मसलों के कारण बार-बार सुर्खियों में रहना पड़ा, एक बार फिर महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया है। 10 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में इस बहुचर्चित मामले की सुनवाई होने जा रही है, जिस पर प्रदेशभर की नजरें टिकी हैं। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में इस फैसले को लेकर उम्मीदों, आशंकाओं और कयासों का दौर लगातार जारी है।
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इस विवाद की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई, जब हाईकोर्ट बार की ओर से दायर एक जनहित याचिका में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण का मुद्दा उठाया गया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद तत्कालीन समय में करीब 10 एकड़ क्षेत्र कब्जा मुक्त कराया गया, लेकिन प्रभावित लोगों ने इस निर्णय को जल्दबाजी में लिया गया कदम बताते हुए उच्च न्यायालय से स्टे प्राप्त कर लिया। धीरे-धीरे मामला जटिल होता गया और अब यह विवाद लगभग 80 एकड़ भूमि से जुड़ गया है, जिस पर 40 से 50 हजार लोगों के रहने की बात सामने आई है।
2016 में दाखिल एक अन्य पीआईएल के बाद रेलवे प्रशासन ने अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही तेज की। गौलापुल क्षेत्र के नीचे अवैध खनन और रेलवे भूमि के दुरुपयोग का उल्लेख करते हुए रेलवे ने लगभग 1,500 लोगों को नोटिस जारी किया। कुछ समय बाद यह संख्या बढ़ाकर 4,365 मकानों को अवैध घोषित कर दिया गया और उन्हें खाली करने के निर्देश दिए गए। इस प्रक्रिया के विरुद्ध प्रभावित लोगों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद 2022 में हाईकोर्ट द्वारा अतिक्रमण हटाने का आदेश पारित हुआ। हालांकि जनवरी 2023 में इस आदेश पर स्टे लगा दिया गया और तब से मामले की सुनवाई जारी है।
इस प्रकरण में याचिकाकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता रविशंकर जोशी का कहना है कि बनभूलपुरा में अतिक्रमण वर्षों से राजनीतिक संरक्षण में पनपता रहा है। वह बताते हैं कि वर्षों पहले ही रेलवे भूमि पर फैल रहे अतिक्रमण को एक गंभीर समस्या के रूप में देखना शुरू कर दिया गया था। उनके अनुसार, अतिक्रमण न केवल अवैध है बल्कि इससे शहर के विकास, नई रेलवे परियोजनाओं और यातायात व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। उनका मानना है कि अदालत का निर्णय भविष्य के लिए एक नजीर बनेगा, क्योंकि अवैध कब्जों को वैधता देना विकास के मार्ग में बाधा है।
दूसरी ओर, प्रभावित समुदाय के प्रतिनिधि अब्दुल मतीन सिद्दीकी का कहना है कि बनभूलपुरा में बसे लोगों में कई ऐसे परिवार हैं जो 40 से 100 वर्षों से यहां रह रहे हैं। वह बताते हैं कि विभिन्न न्यायिक मंचों पर उन्होंने अपने पक्ष को तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि वे अदालत के फैसले का सम्मान करेंगे, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन का मुद्दा केवल कानूनी नहीं बल्कि मानवीय पहलुओं से भी जुड़ा है।
10 दिसंबर को होने वाली सुनवाई न केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य का फैसला भी इसी पर आधारित है। क्या कोर्ट अतिक्रमण हटाने के पक्ष में फैसला देगी या प्रभावित लोगों के पुनर्वास को प्राथमिकता देगी—इस पर फिलहाल सिर्फ अनुमान लगाए जा रहे हैं। प्रदेशभर के लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे हैं, जो आने वाले समय में उत्तराखंड की शहरी संरचना और भूमि प्रबंधन की नीतियों को नई दिशा दे सकता है।





