
गोपेश्वर में राज्यसभा सांसद व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के आगमन पर कांग्रेस और उक्रांद कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाकर विरोध दर्ज कराया। अंकिता भंडारी को न्याय न मिलने के आरोपों ने भाजपा सरकार, प्रशासन और न्याय प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। पुलिस-प्रशासन की भूमिका को लेकर जनता में बढ़ती नाराजगी और आक्रोश साफ दिखाई दिया।
- अंकिता भंडारी मामला बना जनभावनाओं का केंद्र
- सत्ता, व्यवस्था और सच के बीच पिसती जनता
- पुलिस कार्रवाई ने और गहराया अविश्वास
- न्याय की मांग से सड़कों तक पहुँचा आक्रोश
राज शेखर भट्ट
सांसद चैंपियनशिप ट्रॉफी के अंतर्गत खेल प्रतियोगिताओं के शुभारंभ के लिए गोपेश्वर खेल मैदान पहुंचे राज्यसभा सांसद व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का स्वागत उस उत्साह और खेल भावना से नहीं हुआ, जिसकी अपेक्षा ऐसे आयोजनों से की जाती है। इसके बजाय, उनका आगमन जनआक्रोश और राजनीतिक विरोध का प्रतीक बन गया। जैसे ही उनका काफिला लोनिवि आवास गृह से निकलकर पीजी कॉलेज के समीप पहुंचा, पहले से तैयार खड़े कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाते हुए “महेंद्र भट्ट गो बैक” के नारे लगाए।
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यह दृश्य इस बात का संकेत था कि जनता के मन में जमा असंतोष अब किसी औपचारिक मंच या समय की प्रतीक्षा नहीं कर रहा, बल्कि जहां मौका मिलता है, वहीं फूट पड़ता है। इस विरोध का केंद्र कोई व्यक्तिगत विरोध नहीं, बल्कि अंकिता भंडारी को अब तक न्याय न मिल पाने की पीड़ा और आक्रोश था, जो सरकार के दावों की पोल खोलता नजर आया। विरोध कर रहे कार्यकर्ताओं ने भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि सत्ता में बैठी सरकार अंकिता भंडारी हत्याकांड में सच्चाई सामने लाने के बजाय प्रभावशाली और रसूखदार लोगों को बचाने में जुटी हुई है।
सरकार बार-बार न्याय दिलाने के बड़े-बड़े दावे करती रही, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि महीनों बीत जाने के बाद भी न्याय की प्रक्रिया अधूरी और संदिग्ध नजर आती है। सवाल यह उठता है कि यदि सरकार वास्तव में “सबका साथ, सबका न्याय” की बात करती है, तो फिर एक बेटी के मामले में यह संवेदनशीलता क्यों गायब हो जाती है? खेल प्रतियोगिताओं जैसे आयोजनों में भी जब जनता का गुस्सा फूटने लगे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार की नीतियां और बयान लोगों के भरोसे को संतुष्ट करने में पूरी तरह विफल रही हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में न्याय प्रणाली और प्रशासन की भूमिका भी कठघरे में खड़ी नजर आई। विरोध प्रदर्शन के दौरान जब पुलिस ने कार्यकर्ताओं को रोकने का प्रयास किया, तो स्थिति नोकझोंक और झड़प तक पहुंच गई। कार्यकर्ताओं का कहना था कि प्रशासन का रवैया न्याय सुनिश्चित करने वाला नहीं, बल्कि सत्ता की ढाल बनने जैसा है। पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को रोके जाने और बाद में गिरफ्तारियां दिए जाने से यह संदेश गया कि सरकार जनता की आवाज सुनने के बजाय उसे दबाने में अधिक रुचि रखती है।
जब न्याय मांगने वालों को ही कानून-व्यवस्था के नाम पर खामोश किया जाए, तो फिर न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह स्थिति उस कथित “सुशासन” पर भी तंज कसती है, जिसका ढिंढोरा सरकार लगातार पीटती रही है। कांग्रेस प्रवक्ता संदीप झिंक्वाण, धीरेंद्र गरोड़िया, एनएसयूआई के जिलाध्यक्ष सूर्य प्रकाश पुरोहित, नगर अध्यक्ष योगेंद्र सिंह बिष्ट, महेंद्र नेगी सहित कई नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह विरोध केवल किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है।
उक्रांद कार्यकर्ताओं की भागीदारी ने भी यह संकेत दिया कि अंकिता भंडारी का मामला अब दलगत राजनीति से ऊपर उठकर जनभावनाओं का प्रश्न बन चुका है। गोपेश्वर की सड़कों पर दिखा यह विरोध भाजपा सरकार, प्रशासन और न्याय प्रणाली के प्रति बढ़ते असंतोष का आईना है। यह आक्रोश सरकार के लिए एक चेतावनी भी है कि यदि न्याय के सवालों को यूं ही नजरअंदाज किया गया, तो जनता का यह गुस्सा आने वाले समय में और व्यापक रूप ले सकता है, और तब न खेल आयोजन राहत देंगे, न ही मंचों से दिए गए खोखले आश्वासन।





