
यह कविता भारतीय गणतंत्र, संविधान और लोकतंत्र की आत्मा को ओजपूर्ण शब्दों में प्रस्तुत करती है। इसमें जन-शक्ति की सर्वोच्चता, तिरंगे के प्रतीकात्मक अर्थ, अधिकार–कर्तव्य और राष्ट्र निर्माण के सामूहिक संकल्प को प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया है।
- संविधान की आत्मा और जन-शक्ति का स्वर
- तिरंगे के रंगों में लोकतंत्र का संदेश
- अधिकार, कर्तव्य और राष्ट्र सेवा का भाव
- विविधता में एकता का गणतांत्रिक संकल्प
रूपेश कुमार
युवा लेखक / छात्र, चैनपुर, सीवान, बिहार
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गणतंत्र की पुकार उठी है, गूंज रहा हर प्राण,
संविधान की वाणी बोले भारत अमर, महान।
स्याही नहीं, लहू लिखा था, पन्नों पर इतिहास,
जनता सर्वोच्च शक्ति है यही हमारा विश्वास।
न्याय का दीप जले हर आंगन, समानता का हो मान,
बंधुत्व की डोर में बंधे, हर भारतवासी प्राण।
शासन नहीं, सेवा का पथ हो, यही राजधर्म महान,
लोकतंत्र की जय-घोषणा से, गूंजे हिंदुस्तान।
लहर लहर तिरंगा बोले, नभ से धरती तक शान,
केसरिया कहे वीर बनो, मत झुको, मत होना हताश।
श्वेत रंग सिखाए सत्य, शांति का उजियारा,
हरा रंग विश्वास जगाए जीवन का हरियारा।
नीला चक्र जो घूम रहा है, समय से भी तेज़,
रुकना पाप है अन्याय पर, चलता रहना फर्ज़।
संघर्षों की राह में चलकर, जो ना डिगे, ना थके,
वही राष्ट्र का सच्चा सेवक, वही भारत को रचे।
वीरों के लहू से सींची है, यह पावन आज़ादी,
हर सांस में शपथ समाई रक्षा, त्याग, बलिदानी।
सीमा पर जो जाग रहे हैं, संविधान का मान,
माँ भारती की रक्षा में, न्योछावर अपनी जान।
जन-जन की वाणी में बसता, गणतंत्र का यह स्वर,
मत का अधिकार, सत्य का साहस यही लोकतंत्र।
सवाल पूछना धर्म हमारा, उत्तर देना कर्तव्य,
जन-शक्ति से चलता देश है, यही सत्य, यही यथार्थ।
आओ मिलकर शपथ उठाएँ, ऊँचा रहे तिरंगा,
भ्रष्टाचार, अन्याय मिटे, हो भारत चिरनंगा।
धर्म नहीं, कर्म से पूजे, मानवता का मान,
संविधान की राह चलेगा, हर भारत का संतान।
लोकतंत्र की इस मशाल को, युग-युग तक जलाएँ,
विचार, वाणी, कर्म से हम, भारत को सजाएँ।
कागज़ नहीं यह संविधान, आत्मा है राष्ट्र की,
इस पर अडिग खड़ा है शक्ति, भारतवर्ष की।
जय भारत, जय संविधान, जय गणतंत्र का नाद,
कोटि-कोटि कंठों से उठे भारत माता की जय!
करोड़ों नहीं एक संकल्प, एक स्वर, एक पहचान,
विविधता में एकता, मेरा, तेरा, सबका हिंदुस्तान!









