
ओम प्रकाश उनियाल (स्वतंत्र पत्रकार)
सरकार द्वारा तीनों काले कृषि कानून रद्द किए जाने के बाद किसान आंदोलन स्थल से अपने-अपने घरों को लौटते जा रहे हैं। दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर जहां-जहां भी वे काबिज थे अधिकतर पैकअप हो चुके हैं। किसानों में जश्न का माहौल बना हुआ है।
तीनों कृषि कानून वापसी से शायद वे यह सोच रहे हैं कि सरकार उनके आगे झुक गयी है। लेकिन चर्चा है कि सरकार उनके आगे झुकी नहीं है बल्कि ऐसी रणनीति चली है ताकि ‘सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे’।
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किसानों ने भी अभी आंदोलन स्थगित किया है खत्म नहीं। किसान एक साल से भी अधिक समय से अपनी मांगों को लेकर ऐसे जमकर आंदोलनरत रहे कि उन्हें टस से मस कराने की किसी की हिम्मत नहीं हुई। अपनी एकजुटता का परिचय दिया किसानों ने।
सरकार के गले की फांस बनता जा रहा था किसानों का यह आंदोलन। सरकार अपनी हठधर्मिता नहीं छोड़ रही थी तो किसान भी पूरी तरह जिद्द पर अड़े हुए थे। एक प्रकार का विरोधाभास ही कहा जा सकता था इसे। अचानक सरकार का सकारात्मक फैसला शायद इस ओर इशारा भी कर रहा है कि पांच राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं।
आंदोलन का असर खासतौर पर पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनाव पर पड़ सकता है। यदि किसान सरकार से खफा रहता तो चुनाव में भाजपा को खासा नुकसान उठाना पड़ सकता था। पंजाब और उत्तर प्रदेश किसानबहुल राज्य हैं। बेशक किसान बंटे हों। लेकिन प्रधानमंत्री ने ‘तेल देखो, तेल की धार देखो’ वाला मुहावरा का सटीक उपयोग कर पार्टी की उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
फिलहाल किसान भी खुश हैं। भाजपा को इन राज्यों में कुछ न कुछ तो फायदा होगा ही। किसान वोट बैंक पर भाजपा सरकार नजर गढ़ाए हुई थी। चुनाव तक तो यह मामला शांत रहेगा। बाद में किसान की क्या रणनीति बनती है अभी कुछ नहीं कहा जा सकता?
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »ओम प्रकाश उनियाललेखक एवं स्वतंत्र पत्रकारAddress »बंजारावाला, देहरादून (उत्तराखण्ड)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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