
उत्तराखंड में पिछले 23 वर्षों में जानलेवा भूस्खलनों की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं, जिनमें 64 घटनाओं में 1516 लोगों की मौत हुई है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के अध्ययन में सामने आया है कि भूकंप से कमजोर हो रही चट्टानें और लंबे समय तक होने वाली बारिश इन घटनाओं की मुख्य वजह हैं। विशेष रूप से मेन सेंट्रल थ्रस्ट और नीस- क्वार्टजाइट चट्टानों वाले क्षेत्रों में खतरा अधिक पाया गया है।
- 64 घातक भूस्खलनों में 1516 लोगों की मौत
- मेन सेंट्रल थ्रस्ट के आसपास सबसे अधिक खतरा
- मानसून में 52 बड़े भूस्खलन, 2000 के बाद बढ़ी घटनाएं
- नीस और क्वार्टजाइट चट्टानों वाले क्षेत्रों में ज्यादा हादसे
देहरादून। उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार गहराता जा रहा है। पिछले 23 वर्षों में राज्य में जानलेवा भूस्खलनों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान द्वारा किए गए विस्तृत अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि वर्ष 1868 से 2023 के बीच राज्य में 64 रिपोर्टेड घातक भूस्खलन हुए, जिनमें कुल 1516 लोगों की जान गई। अध्ययन में भूस्खलन के पीछे भूगर्भीय संरचना, चट्टानों के प्रकार, ढलान की स्थिति, वर्षा के पैटर्न और भूकंपीय गतिविधियों जैसे विभिन्न कारकों का विश्लेषण किया गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार अधिकांश घातक भूस्खलन भूकंपीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) के आसपास के क्षेत्रों में हुए हैं। इन क्षेत्रों में बार-बार आने वाले छोटे भूकंप चट्टानों की आंतरिक संरचना को कमजोर कर देते हैं, जिससे चट्टानों के जोड़ ढीले पड़ जाते हैं। जब इन कमजोर चट्टानों में बारिश का पानी प्रवेश करता है, तो उनकी पकड़ और कमज़ोर हो जाती है, जिससे भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है। अध्ययन में यह भी स्पष्ट हुआ है कि हल्के भूस्खलन सामान्यतः 24 घंटे से कम अवधि की वर्षा के दौरान होते हैं, जबकि बड़े और विनाशकारी भूस्खलन 48 से 72 घंटे तक लगातार बारिश होने पर अधिक देखने को मिलते हैं। बढ़ते भूजल स्तर और बदलते वर्षा पैटर्न भी इन घटनाओं को प्रभावित कर रहे हैं।
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रिपोर्ट के अनुसार लगभग 67 प्रतिशत जानलेवा भूस्खलन वर्ष 2000 के बाद हुए हैं, जबकि 84 प्रतिशत अत्यधिक वर्षा की घटनाएं भी इसी अवधि में दर्ज की गईं। मानसून (जून से सितंबर) के दौरान 52 बड़े भूस्खलन हुए, जो इस मौसम की संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। वर्ष 2017 में सर्वाधिक पांच घातक भूस्खलन दर्ज किए गए। भूवैज्ञानिक विश्लेषण में यह भी पाया गया कि नीस (19 घटनाएं) और क्वार्टजाइट (14 घटनाएं) चट्टानों वाले क्षेत्रों में भूस्खलन अधिक हुए हैं। लाइमस्टोन क्षेत्रों में भी कई घटनाएं दर्ज की गईं। अध्ययन से जुड़ा शोधपत्र हाल ही में Indian Academy of Sciences के जर्नल Journal of Earth System Science में प्रकाशित हुआ है।
उत्तराखंड में अतीत की बड़ी त्रासदियों पर नजर डालें तो 18 अगस्त 1998 को पिथौरागढ़ जिले के मालपा में हुए भूस्खलन में 210 लोगों की मृत्यु हुई थी। वर्ष 1880 में नैनीताल में 151 लोगों की जान गई थी। अगस्त 1951 में रुद्रप्रयाग जिले के शिवनंदी गांव में 100 लोगों की मृत्यु हुई, जबकि अगस्त 1998 में मद्महेश्वर घाटी में 103 लोगों और जुलाई 1990 में नीलकंठ क्षेत्र में 100 लोगों की जान गई थी। विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में बढ़ती भूकंपीय गतिविधियां, अनियोजित विकास, सड़कों का चौड़ीकरण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव भी भूस्खलन की तीव्रता और आवृत्ति को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, सतत विकास की नीति और प्रभावी आपदा प्रबंधन रणनीति अपनाना समय की मांग है।






