
🌟🌟🌟
देहरादून के कालसी क्षेत्र में पाकिस्तान/पीओके के एक व्यक्ति द्वारा जमीन पर किया गया दावा प्रशासनिक जांच में पूरी तरह फर्जी पाया गया। कार्रवाई करते हुए राजस्व विभाग ने 0.7688 हेक्टेयर विवादित भूमि राज्य सरकार के नाम दर्ज कर दी।
- पीओके निवासी का वीडियो दावा गलत साबित, राजस्व अभिलेख से 8 नाम हटे
- जम्मू-कश्मीर के गुलाम हैदर की खरीद-फरोख्त पर भी उठे सवाल
- इमामबाड़ा मस्जिद के नाम दान की कहानी भी फर्जी निकली
- जनजातीय क्षेत्र में नियम विरुद्ध सौदेबाजी पर प्रशासन की सख्ती
देहरादून। कालसी तहसील के हरिपुर व्यास क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे भूमि विवाद पर आखिरकार बड़ा प्रशासनिक निर्णय सामने आ गया है। जिस जमीन पर पाकिस्तान/पीओके के एक व्यक्ति ने अपने दादा होने का दावा करते हुए स्वामित्व जताया था, उसे जांच के बाद पूरी तरह फर्जी पाया गया और राजस्व विभाग ने इसे राज्य सरकार में निहित कर दिया। कुल 0.7688 हेक्टेयर भूमि अब सरकारी खाते में दर्ज कर दी गई है।
Government Advertisement...
उप जिलाधिकारी कालसी प्रेमलाल ने विस्तृत आदेश जारी कर विवादित भूमि पर दर्ज आठ व्यक्तियों—रजब अली, मोहम्मद शफी, मोहम्मद अली, मोहम्मद शौकत अली, तेवर अली, असगर अली, सफदर अली और विल्किस बानो—के नाम राजस्व अभिलेखों से हटाकर सरकार का नाम चढ़ा दिया। जिलाधिकारी सविन बंसल ने पुष्टि की कि प्रशासनिक जांच में पाकिस्तान/पीओके निवासी द्वारा जताया गया पुराना दावा और उससे जुड़े वीडियो, दोनों ही तथ्यहीन पाए गए।
विवाद की जड़—गुलाम हैदर की संदिग्ध खरीद
यह विवाद वर्ष 2022 में शुरू हुआ, जब जम्मू-कश्मीर के निवासी गुलाम हैदर ने हरिपुर कालसी क्षेत्र में जमीन खरीदी। हैदर जम्मू पुलिस में तैनात रहा था और उस पर आतंकियों की मदद पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगने के बाद उसे निलंबित भी कर दिया गया था।
शक इस बात पर गहरा हुआ कि जनजातीय क्षेत्र में भूमि खरीदने के कड़े नियमों के बावजूद उसने फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से खरीद-फरोख्त पूरी की। आरोप था कि उसने अपने एक स्थानीय रिश्तेदार की मदद से परिवार रजिस्टर में नाम दर्ज कराया, स्थायी निवास प्रमाण-पत्र बनवाया और फिर जमीन को आठ अलग-अलग लोगों को बेच दिया।
पीओके निवासी के वीडियो से बढ़ा तनाव
विवाद उस समय और गहराया जब पाकिस्तान/पीओके से एक व्यक्ति का वीडियो सामने आया, जिसने अपना नाम अब्दुल्ला बताते हुए दावा किया कि यह जमीन उसके दादा मोटा अली की थी और इसे इमामबाड़ा मस्जिद को दान किया गया था। एक और वीडियो में वही व्यक्ति एक मौलवी के साथ दिखा और जमीन पर अपना अधिकार दोहराया। इसके बाद कई पक्ष सामने आए और जमीन पर स्वामित्व जताने लगे, जिससे विवाद और व्यापक हो गया।
प्रशासन की सख्ती—सभी दावे खारिज
जमानत, दस्तावेजों और वीडियो दावों की गहन जांच के बाद प्रशासन ने पाया कि—
- पाकिस्तानी/पीओके निवासी का दावा पूरी तरह फर्जी था
- गुलाम हैदर ने नियमों के विरुद्ध, संदिग्ध दस्तावेजों पर जमीन खरीदी
- जनजातीय क्षेत्र में भूमि खरीद में स्पष्ट नियम उल्लंघन हुआ
- बाद में जमीन के टुकड़ों को कई लोगों को बेचना भी अवैध था
इन्हीं आधारों पर राज्य सरकार में भूमि निहित करने का प्रविधान लागू किया गया और पूरी संपत्ति सरकार के नाम दर्ज कर दी गई। जिलाधिकारी बंसल ने कहा कि भविष्य में भी जनजातीय क्षेत्रों में नियम विरुद्ध खरीद-फरोख्त और फर्जी दावों पर कठोर कार्रवाई जारी रहेगी, ताकि बाहरी तत्वों द्वारा भूमि पर गलत तरीके से कब्जा करने की प्रवृत्ति समाप्त हो सके।





