
यह कविता दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण की भयावह स्थिति को उजागर करती है और उसके लिए मानव स्वार्थ, सुविधाभोगी जीवनशैली तथा प्रकृति के दोहन को जिम्मेदार ठहराती है। साथ ही, यह युवाओं को आदतें बदलने, स्वच्छता अपनाने और पर्यावरण संरक्षण के लिए जागरूक होने का संदेश देती है।
- जहरीली हवा का संकट
- सुविधाओं और स्वार्थ की कीमत
- प्रकृति से खिलवाड़
- समाधान की पुकार
गणपत लाल उदय
अजमेर, राजस्थान
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आज दिल्ली का ये प्रदूषण कर रहा सबको परेशान,
उजालों की बजाय अंधेरे में धँस रहा हर एक इंसान।
फैल रहा ज़हर हवा में, गटक रहा है सभी का अरमान,
यश-धन-पद के लिए बढ़ाने आए जो अपनी शान।।
सुबह से लेकर देर रात तक यहाँ रहता ऐसा माहौल,
धूल, धुआँ और प्रदूषण से जनमानस नहीं खुशहाल।
सर्दी, गर्मी व बरसात हो, यहाँ रुक जाए हवाई उड़ान,
रेल, बस स्टेशनों पर यात्री, पर्यटकों का बुरा हाल।।
हाँ, परेशानी उनको कुछ नहीं जो ए.सी. चलाए बैठे हैं,
पेड़ काटकर दसों कोठी बनाकर आराम से सोते हैं।
घर का एक सदस्य ही पाँच से छह गाड़ियाँ रखता है,
वृक्षारोपण की बोलते हैं, जो वृक्ष स्वयं कटवाते हैं।।
ना करो खिलवाड़ प्रकृति से, इसे साफ हमें रखना है,
पेड़ और पौधे लगाकर फिर जनजीवन महकाना है।
नदी, नाले, फुटपाथ हर जगह साफ-सफाई रखना है,
करो यह प्रयास, जवानों, कोहरे की चादर हटाना है।।
संस्कार डालें व आदत बदलें नवयुवक-नौजवानों में,
ठहराव नहीं, अब आदत डालें, शर्माएँ नहीं सफाई में।
निकाल फेंके ऐसे वाहन, चिमनी, फैक्ट्री गलियारों से,
इंसान बनकर जीना सीखो, विचारना इसके बारे में।।









