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जोधपुर में आयोजित समीक्षा कार्यक्रम में साहित्यकार सुनील कुमार माथुर ने कहा कि धर्म हमें आदर्श जीवन जीने की कला सिखाता है और वही जीवन को अर्थ देता है। उन्होंने आचार्य तुलसी की पुस्तक मेरा धर्म केन्द्र और परिधि को धर्म संबंधी भ्रांतियों के निराकरण का सशक्त माध्यम बताया।
- आचार्य तुलसी की पुस्तक पर सुनील कुमार माथुर की समीक्षा
- धर्म अखंड सत्य है, उसे खंडों में नहीं बांटा जा सकता
- बौद्धिक चुनौतियों में वही धर्म टिकेगा जो तर्क सह सके
- धर्म से दशा और दिशा दोनों में परिवर्तन संभव
जोधपुर। धर्म हमें आदर्श जीवन जीने की कला सिखाता है। धर्म है तो हम हैं, धर्म है तो जीवन है। यह उद्गार अणुव्रत लेखक मंच के सदस्य एवं साहित्यकार सुनील कुमार माथुर ने आचार्य तुलसी की पुस्तक मेरा धर्म केन्द्र और परिधि की समीक्षा करते हुए व्यक्त किए। माथुर ने कहा कि जो व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलता है, उसका जीवन स्वर्णिम हो जाता है।
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आचार्य तुलसी ने इस पुस्तक में गागर में सागर भरने का प्रयास किया है। उन्होंने बताया कि धर्म एक अखंड सत्य है, जिसे खंडों में या अपने-पराए के भेदों में नहीं बांटा जा सकता। धर्म व्यापक, शाश्वत, सार्वभौम और सार्वजनिक है। वह अविभक्त है। आज धर्म बुद्धि की कसौटी पर चढ़ा हुआ है। यह वैज्ञानिक युग है, तर्क का बोलबाला है, स्वतंत्र चिंतन का मूल्य बढ़ रहा है और बौद्धिक विकास की बाढ़ आ रही है। ऐसी स्थिति में धर्म की रूढ़ धारणाएं अपना अस्तित्व बनाए नहीं रख सकतीं।
उन्होंने कहा कि आज उसी धर्म का अस्तित्व रह सकता है, जिसमें बौद्धिक चुनौतियों को झेलने की क्षमता हो। सत्य बुद्धि से अधिक सशक्त है। हम सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा दे सकते हैं और प्रेरणा से दशा व दिशा में बदलाव लाया जा सकता है। आचार्य तुलसी ने लिखा है कि मेरा धर्म केन्द्र और परिधि इसी उद्देश्य को साकार करने का एक उपक्रम है।
इसे पढ़कर धर्म और समुदाय से संबंधित भ्रांतियों का निराकरण किया जा सकता है तथा अपनी अवधारणाओं को स्पष्ट और व्यापक बनाया जा सकता है। यही इस पुस्तक की सार्थकता है। अपने आलेखों के माध्यम से उन्होंने धर्म पर व्यापक चर्चा की है। पुस्तक में भले ही आलेख छोटे-छोटे हैं, लेकिन उनके जरिए ज्ञान की गंगा प्रवाहित होती है।
News Source : सुनील कुमार माथुर, सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच, स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार, जोधपुर, राजस्थान








