
शराब की दुकान पर पुलिस की पहरेदारी से भड़की जनता, बोली– उत्तराखंड में आस्था नहीं, अब शराब की रखवाली हो रही है…
राज शेखर भट्ट, देहरादून (उत्तराखंड)
देहरादून। उत्तराखंड में सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हो रही है जिसमें पुलिस के जवानों का एक दल शराब की दुकान के बाहर तैनात दिखाई दे रहा है। तस्वीर के पीछे लगे बड़े होर्डिंग पर लिखा है— “विदेशी मदिरा की दुकान, ढालवाला, मुनि की रेती”। यह दृश्य आम लोगों के बीच तीखी प्रतिक्रिया का कारण बन गया है। लोगों का कहना है कि जहां मंदिरों, मेलों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में सुरक्षा की कमी रहती है, वहीं शराब की दुकानों की रखवाली में पुलिस की भारी तैनाती समझ से परे है।
सोशल मीडिया पर उमड़ा आक्रोश – Express Live Uttarakhand की इस पोस्ट पर लोगों ने जमकर नाराज़गी जताई। एक यूज़र ने लिखा, “तब मेरे घर वाले कह रहे हैं दारू छोड़ दे, इन्हें कैसे बताऊं कि दारू कितनी महत्वपूर्ण है, Z+ सिक्योरिटी मिली है दारू को।” वहीं एक अन्य ने व्यंग्य किया, “ऐसे ही हरिद्वार में पूरी सुरक्षा देते हैं पुलिस दारू बेचने वालों को।” कई लोगों ने लिखा कि जब राज्य पुलिस उत्तराखंड को नशामुक्त बनाने की बात करती है तो शराब के ठेकों पर उनकी ड्यूटी क्यों लगाई जा रही है।
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जनता ने पूछा, पुलिस जनता की है या ठेकों की – कई टिप्पणियों में सवाल उठे कि आखिर शराब की दुकानों को इतनी सुरक्षा क्यों दी जा रही है। लोगों ने कहा कि सरकार यदि नशामुक्त समाज की दिशा में काम कर रही है, तो पुलिस बल को जनता की सेवा और कानून व्यवस्था बनाए रखने में लगाया जाना चाहिए, न कि शराब की बिक्री सुनिश्चित करने में। एक टिप्पणी में लिखा गया— “उतराखंड का मेन बिजनेस और पॉलिटिक्स दारू ठेका खोलो या पिलाओ फिर राजनीति करो।” एक अन्य यूज़र ने कटाक्ष करते हुए कहा, “पुलिस वाले ठेकों की रखवाली करें या जनता की सुरक्षा करें? लगता है अब दारू भी VIP बन गई है।”
राज्य स्थापना दिवस : पोस्टर की चकाचौंध में गुम हकीकत की तस्वीर
पुलिस की छवि पर सवाल – शराब के ठेकों पर पुलिस बल की मौजूदगी ने आम जनता के मन में कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं। लोग यह भी कह रहे हैं कि यदि यही स्थिति रही तो राज्य में कानून व्यवस्था से अधिक शराब व्यवस्था पर ध्यान दिया जाएगा। राज्य में पहले ही शराब से संबंधित अपराधों की संख्या बढ़ रही है, ऐसे में पुलिस बल की तैनाती इन दुकानों पर जनता के हितों के विपरीत प्रतीत होती है।
जनता ने सरकार से उठाई मांग – कई नागरिकों ने यह भी कहा कि यदि सरकार शराब से होने वाली आमदनी को विकास का प्रतीक मान रही है, तो यह समाज के नैतिक पतन की शुरुआत है। लोगों ने मुख्यमंत्री से अपील की है कि शराब दुकानों की सुरक्षा के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और महिलाओं की सुरक्षा पर फोकस किया जाए।
स्थापना दिवस की चमक में मुनिकीरेती ठेका और फुटपाथ पर सोता इंसान
नैतिक सवाल भी उठे – यह तस्वीर न केवल पुलिस प्रशासन पर सवाल उठाती है बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि क्या विकास का अर्थ अब सिर्फ राजस्व बढ़ाना रह गया है? क्या समाज में आस्था और संस्कृति की रक्षा से अधिक महत्वपूर्ण अब शराब की बिक्री हो गई है? उत्तराखंड की जनता ने इस घटना को प्रदेश की सामाजिक असंवेदनशीलता की मिसाल बताते हुए कहा कि जब पहाड़ों में स्कूल, अस्पताल और रोजगार ठप हैं, तब पुलिस का शराब की दुकानों पर पहरा लगाना “विकास” नहीं, “विकृति” है।





