
जोधपुर निवासी अमित माथुर ने दुर्लभ डाक टिकटों का अनोखा संग्रह तैयार किया है, जो भारत की संस्कृति, इतिहास और महान व्यक्तित्वों की झलक प्रस्तुत करता है। यह संग्रह केवल शौक नहीं, बल्कि विरासत को सहेजने का एक प्रयास है।
- डाक टिकटों में इतिहास की झलक
- शौक से सहेजी गई सांस्कृतिक धरोहर
- अनोखा संग्रह: हर टिकट एक कहानी
- विरासत बचाने की अनूठी पहल
सुनील कुमार माथुर
हर व्यक्ति के पास अनोखा व अद्वितीय खजाना होता है, जिसकी देखरेख कीमती सोने की तरह करते हैं, क्योंकि शौक पूरा करना भी कोई आसान काम नहीं है। उसके लिए भी जी-जान से जुटना पड़ता है और पूरी सार-संभाल करनी पड़ती है, तब जाकर शौक पूरे होते हैं।
पीडब्ल्यूडी कॉलोनी, जोधपुर निवासी अमित माथुर (सीईओ – आईटीएस डिजिटल इंडिया) ने भी तरह-तरह के डाक टिकटों का संकलन कर रखा है। उनके पिता स्वर्गीय श्रवण कुमार माथुर ने यह शौक आरंभ किया था, जिसे आज उनके पुत्र अमित माथुर ने आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। उनके संकलन में 150 से 200 तक तरह-तरह के डाक टिकट हैं, जो अपनी कहानी अपनी ही जुबानी कह रहे हैं।
दुर्लभ डाक टिकटों में जीजाबाई, रुक्मिणी देवी, रानी अवंतीबाई, ताजमहल, बाल दिवस, जयदेव और गीत गोविंद, मोहनलाल सुखाड़िया, भारतीय डाक—एक विश्वस्त साथी, पंडित सूर्य नारायण व्यास, बुद्ध, किशोर कुमार, नरगिस दत्त, समर्थ रामदास, सम्राट पृथ्वीराज चौहान, रामसेवक यादव के डाक टिकट संग्रह में हैं।
इसके अतिरिक्त सिंह और खरगोश, तिरुमति रुक्मिणी लक्ष्मीपति, स्वतंत्रता के चालीस वर्ष, ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता, दामोदर धर्मानंद कोसांबी, ए. डी. श्रॉफ, हेमंत कुमार जैसे डाक टिकटों के अतिरिक्त अन्य अनेक डाक टिकटों का संकलन है, जो आज भी अपनी कहानी अपनी जुबानी कह रहे हैं।
अमित माथुर ने बताया कि डाक टिकट संकलन करना ही उनका ध्येय नहीं है, अपितु ये डाक टिकट कोई साधारण वस्तु नहीं हैं, बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति की झलक हैं, जो आज दुर्लभ होती जा रही हैं। इन्हें बचाना और सहेजना समय की आवश्यकता है।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच एवं स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
33 वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुंआ, पालरोड जोधपुर, राजस्थान









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