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देहरादून में आयोजित क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल के एक अहम सत्र में उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी अशोक कुमार ने कहा कि पाकिस्तान आतंकवाद के मुद्दे पर चुप बैठने वाला नहीं है, इसलिए भारत को हर स्तर पर लगातार सतर्क रहना होगा। उन्होंने आतंकवाद से निपटने के लिए केवल खुफिया जानकारी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई, अडिग इच्छाशक्ति और बेहतर आपसी समन्वय को अनिवार्य बताया।
- आतंकवाद से लड़ाई में ठोस कार्रवाई और इच्छाशक्ति को बताया जरूरी
- खुफिया जानकारी साझा न होने पर पूर्व डीजीपी ने जताई चिंता
- ड्रोन, साइबर हमले और जमीनी ऑपरेशन बने नई चुनौती
- फेस्टिवल में अपराध, आतंकवाद और समाज से जुड़े कई सत्रों का आयोजन
देहरादून। क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल में राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद जैसे गंभीर विषयों पर केंद्रित सत्र ‘डिस्मैंटलिंग टेरर नेटवर्क्स: लेसंस फ्रॉम रेड फोर्ट’ चर्चा का सबसे अहम केंद्र रहा। इस सत्र में उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कश्मीर समस्या की जड़ सीमा पार है और पाकिस्तान इस मोर्चे पर चुप बैठने वाला नहीं है। ऐसे में देश को हर समय सतर्क रहना होगा और सुरक्षा एजेंसियों को किसी भी तरह की ढिलाई नहीं बरतनी चाहिए।
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पूर्व डीजीपी अशोक कुमार ने कहा कि आतंकवाद से निपटने के लिए केवल खुफिया जानकारी जुटाना पर्याप्त नहीं है। जब तक उस जानकारी पर ठोस और समयबद्ध कार्रवाई नहीं होगी, तब तक खतरा बना रहेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में अडिग राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति आवश्यक है, ताकि जुल्म और जिहाद दोनों का मजबूती से सामना किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार राज्य पुलिस बल प्रतिस्पर्धा या सुरक्षा कारणों से महत्वपूर्ण सूचनाएं साझा नहीं करते, जो आधुनिक आतंकवाद विरोधी अभियानों में एक बड़ी कमजोरी बन जाती है।
सत्र में यह भी रेखांकित किया गया कि आज का आतंकवाद पारंपरिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहा है। ड्रोन तकनीक, साइबर हमले और जमीनी स्तर पर होने वाले ऑपरेशनों का मिश्रण सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई और जटिल चुनौतियां खड़ी कर रहा है। अशोक कुमार ने कहा कि जब तक विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और साझा रणनीति नहीं बनेगी, तब तक इन खतरों से प्रभावी ढंग से निपटना मुश्किल रहेगा।
इस सत्र में सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार सिंह ने आतंकवादी हमलों को रोकने में खुफिया जानकारी की निर्णायक भूमिका पर विस्तार से बात की। उन्होंने स्वदेशी तकनीक के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि आत्मनिर्भर तकनीकी क्षमताएं ही देश की दीर्घकालिक सुरक्षा को मजबूत बना सकती हैं। वहीं, सेवानिवृत्त कर्नल सुनील कोटनाला ने बताया कि आतंकवादी अब मोबाइल आधारित कट्टरपंथ और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे शहरी क्षेत्रों में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और भी जटिल हो गई है और आम नागरिकों के लिए जोखिम बढ़ गया है।
क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल के अन्य सत्रों में अपराध साहित्य, समाज और तकनीक के विभिन्न पहलुओं पर भी चर्चा हुई। ‘सिंस, सीक्रेट्स एंड सुपरहीरोज’ सत्र में लेखकों ने कहा कि अपराध कथा तभी प्रभावशाली बनती है, जब लेखक अपराधियों की मानसिकता को गहराई से समझे। ‘डेंजर इन द डीएमएस’ सत्र में इंटरनेट मीडिया और डेटिंग एप्स में छिपे खतरों को लेकर चेताया गया, जबकि अन्य सत्रों में साइबर अपराध, पुलिसिंग, कानूनी सुधार, क्रिकेट में भ्रष्टाचार और स्पॉट फिक्सिंग जैसे विषयों पर भी खुलकर विचार रखे गए।
कुल मिलाकर, यह फेस्टिवल केवल साहित्यिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध, आतंकवाद और बदलते सामाजिक खतरों पर गंभीर विमर्श का मंच भी बना, जहां विशेषज्ञों ने स्पष्ट संदेश दिया कि आने वाले समय में सतर्कता और समन्वय ही सबसे बड़ी सुरक्षा कवच है।





