
औरंगाबाद में आयोजित साहित्यिक समारोह में ‘समकालीन जवाबदेही’ पत्रिका के निबंध विशेषांक 2025 का विमोचन किया गया। वरिष्ठ साहित्यकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का सशक्त दस्तावेज बताया, जबकि संपादक डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद मिश्र ने निबंध में सहज और सरल भाषा के महत्व पर प्रकाश डाला।
- अम्बे आश्रम में साहित्यिक समारोह का गरिमामय आयोजन
- निबंध विशेषांक 2025 का विधिवत विमोचन
- विषयगत विविधता और बौद्धिक मौलिकता की मिसाल
- सहज भाषा से निबंध की उत्कृष्टता पर जोर
औरंगाबाद (बिहार): समाज, साहित्य एवं संस्कृति के साझा अभियान के तहत मंगलवार को पटेल नगर स्थित नागा बिगहा के अम्बे आश्रम में एक गरिमामय साहित्यिक समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर प्रतिष्ठित पत्रिका ‘समकालीन जवाबदेही’ (निबंध विशेषांक 2025 संयुक्तांक) का विधिवत विमोचन किया गया।
साहित्यिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य का दर्पण पत्रिका का विमोचन करते हुए आचार्यकुल के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं जीवनधारा नमामि गंगे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, वरिष्ठ साहित्यकार व इतिहासकार सत्येन्द्र कुमार पाठक ने कहा कि ‘समकालीन जवाबदेही’ मात्र एक पत्रिका नहीं, बल्कि साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को स्वर देने वाला एक सशक्त माध्यम है।
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उन्होंने जोर देकर कहा कि इस विशेषांक में शामिल निबंधों में भाषायी विचारात्मक आवेग, भाव बुद्धि और गहन चिंतन का अद्भुत समावेश है, जो इसे पाठकों के लिए संग्रहणीय बनाता है। विषयगत विविधता और मौलिकता श्री पाठक ने संपादक डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद मिश्र के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि इस अंक में समीक्षात्मक, विचारात्मक, चरित्र प्रधान, भावनात्मक, ललित निबंध, आत्मपरक, समसामयिक और धर्म-अध्यात्म जैसे विविध विषयों को एक साथ पिरोया गया है।
यह पत्रिका की मूलभूत आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर पाठकों को परोसा गया एक उत्कृष्ट बौद्धिक उपहार है। सहज भाषा से बढ़ती है निबंध की उत्कृष्टता पत्रिका के संपादक और जाने-माने साहित्यविद डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद मिश्र ने अपने संबोधन में निबंध कला की बारीकियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “यद्यपि निबंध में भाषायी कसावट अपेक्षित होती है, लेकिन यदि उसकी भाषा सहज, सरल और स्वाभाविक हो, तो उसकी उत्कृष्टता और भी बढ़ जाती है।
उन्होंने बताया कि इसी भाव को ध्यान में रखते हुए विभिन्न निबंधकारों की रचनाओं को इस संयुक्तांक में संकलित किया गया है ताकि समाज के हर वर्ग तक साहित्यिक विमर्श पहुँच सके। इस कार्यक्रम में स्थानीय साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और संस्कृति कर्मियों ने हिस्सा लिया और समाज में वैचारिक क्रांति के लिए पत्रिकाओं की निरंतरता पर बल दिया।







