
सत्येन्द्र कुमार पाठक
करपी, अरवल, बिहार
एक घने जंगल में, टिक-टिक नाम की एक छोटी गिलहरी रहती थी। टिक-टिक बहुत प्यारी थी, लेकिन उसमें एक बुरी आदत थी—वह बहुत आलसी थी। उसे लगता था कि मेहनत करना बेकार है। एक दिन, जंगल का बुद्धिमान उल्लू बाबा, टिक-टिक के पास आया और उसे एक खास बीज दिया।उल्लू बाबा ने कहा, “टिक-टिक, यह एक जादुई बीज है। इसे जहाँ भी तुम बोओगी, वहाँ तुम्हें वह मिलेगा जिसकी तुम्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी। लेकिन याद रखना, बीज बोने के बाद इसे रोज़ पानी देना होगा और धूप से बचाना होगा, तभी जादू काम करेगा।”
टिक-टिक ने बीज ले लिया। वह सोचने लगी, “मुझे तो सबसे ज़्यादा ढेर सारे मीठे अखरोट चाहिए, ताकि मुझे रोज़ खाना न ढूँढ़ना पड़े!” अगले दिन, टिक-टिक ने जल्दी से बीज को एक कोने में गाड़ दिया। वह पूरे दिन इंतज़ार करती रही, लेकिन कुछ नहीं हुआ। शाम को, वह थककर सो गई। दूसरे दिन, उसे याद आया कि उल्लू बाबा ने कहा था—”रोज़ पानी देना।””अरे! इतनी मेहनत कौन करे!” टिक-टिक ने मुँह बनाया, लेकिन अखरोट के लालच में वह थोड़ा सा पानी डालकर फिर खेलने चली गई।
तीसरे दिन, जब वह फिर से बीज के पास गई, तो उसने देखा कि बीज की मिट्टी सूख चुकी थी। बीज से एक छोटा सा अंकुर बाहर आने की कोशिश कर रहा था, लेकिन पानी न मिलने के कारण वह मुरझा गया था। टिक-टिक उदास हो गई और उल्लू बाबा के पास रोने लगी, “बाबा! आपका बीज तो खराब निकला! मुझे अखरोट नहीं मिले।” उल्लू बाबा मुस्कुराए और बोले, “बेटी, बीज खराब नहीं था। असल में, मेहनत ही असली जादू है।
तुम जिस चीज की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, वह थी ‘परिश्रम’ और ‘धैर्य’। जादुई बीज ने तुम्हें यही दिखाने की कोशिश की कि बिना प्रयास के कोई फल नहीं मिलता।” टिक-टिक को अपनी गलती समझ आ गई। उसने उस बीज को फिर से सींचा, पर इस बार पूरी लगन से, रोज़ समय पर। कुछ ही दिनों में, वह बीज एक मज़बूत पेड़ बन गया, जिस पर मीठे अखरोट लटक रहे थे। सीख: सफलता केवल इच्छा करने से नहीं मिलती, बल्कि निरंतर प्रयास और कड़ी मेहनत से मिलती है। आलस्य सबसे बड़ा दुश्मन है।








