
यह कहानी एक ग्रामीण बालिका की है, जिसकी पढ़ाई घरेलू ज़िम्मेदारियों, सामाजिक रूढ़ियों और बाल विवाह की छाया में छूट जाती है। संवेदनशील भाषा में यह रचना बताती है कि कैसे ‘ड्रॉपआउट’ कहलाने वाली बच्चियाँ वास्तव में व्यवस्था द्वारा शिक्षा से बाहर धकेली जाती हैं।
- जब किताबों की जगह हथेलियों पर आटा जम गया
- आधी स्कूल, आधा घर: एक बच्ची की अनकही कहानी
- बेटी बची, पर पढ़ाई छूट गई
- ड्रॉपआउट नहीं, धकेली गई: गाँव की लड़की की व्यथा
– डॉ. प्रियंका सौरभ
मिट्टी की उन पगडंडियों पर, जहाँ सुबह-सुबह धूप भी संकोच से उतरती है, एक छोटी-सी लड़की आज फिर घर की देहरी पर रुक गई। उसका नीला-सा, फीका पड़ चुका स्कूल-फ्रॉक जैसे हर रोज़ उससे पूछता हो—“चलें?” और चौखट पर खड़ी माँ की आँखें, खाली बर्तनों और अधूरे कामों की तरफ़ इशारा करके जवाब दे देती हैं—“आज नहीं, अभी नहीं।” किताबें उसके बैग में नहीं, मन में बजते किसी दूर के गीत की तरह रखी हैं; पर उस गीत की आवाज़ बर्तन टकराने की खनखनाहट और चूल्हे के धुएँ में हर रोज़ कुछ और कम हो जाती है। कभी-कभी वह अपनी ही छाया को देखती है—सोचती है, अगर यह छाया कक्षा की दीवार पर पड़ती, ब्लैकबोर्ड के सामने खड़ी होती, तो कितना अच्छा होता। खड़िया से लिखते-लिखते उँगलियाँ सफ़ेद हो जातीं, और वह अपने नाम के नीचे भविष्य का कोई अदृश्य वाक्य पूरा कर पाती। पर उसके नाम के साथ गाँव की बैठकों में सिर्फ़ दो शब्द जुड़े हैं—“क्यों पढ़ाना?” यह प्रश्न नहीं, एक फ़ैसला है, जो उसके जन्म से पहले ही किसी पुरानी बैठक में कर लिया गया था।
उसकी सहेली सुबह-सुबह साइकिल पर स्कूल जाती है; उसके सिर पर गुँथा हुआ जूड़ा हवा में थोड़ा डोलता है और बालों के बीच से झाँकती एक छोटी-सी टिकुली किसी नए रास्ते का नक्शा लगती है। वह उसे जाती देखती है, फिर अपनी हथेलियों पर जमे आटे को देखती है, जैसे किसी ने उसकी उँगलियों को अक्षरों की जगह रोटियों के गोल आकार तक सीमित कर दिया हो। घर के आँगन में पसरा हुआ कपड़ों का ढेर, रोते हुए छोटे भाई की आवाज़ और रसोई से आती माँ की पुकार—ये सब मिलकर उसकी किताबों के पन्नों को धीरे-धीरे बंद कर देते हैं, जैसे किसी कविता की आख़िरी पंक्ति बिना बोले ही अधूरी छोड़ दी गई हो। शाम को जब गाँव की पगडंडियों पर धूल बैठने लगती है, तो स्कूल से लौटते बच्चों की आवाज़ें हवा में तैरती हैं—“मैडम ने आज नया चैप्टर शुरू करवाया”, “कल टेस्ट है”, “मार्क्स कम आए तो डाँट पड़ेगी।” वह अनजाने ही मुस्कुरा देती है; उसे टेस्ट से नहीं डर लगता, उसे तो उस दिन से डर लगता है जब उसकी किताबों पर हल्दी लगा दी जाएगी और कहा जाएगा—“अब इसे संभाल कर रख दो, तुम्हें जल्दी ही किसी और घर जाना है।” उसके लिए रिपोर्ट-कार्ड नहीं बनता, उसके लिए रजिस्टर में सिर्फ़ “ड्रॉपआउट” की ठंडी-सी पंक्ति दर्ज कर दी जाती है—एक और नाम, जो आँकड़ों में शामिल होकर भी कहानियों से ग़ायब हो जाता है।
कभी-कभी रात को छत पर लेटे-लेटे वह आसमान के तारों को जोड़कर देखती है—सोचती है, क्या कोई तारा ऐसा है जो सिर्फ़ लड़कियों के नाम से चमकता हो? उसे याद है, एक बार टीचर ने कहा था—“बेटा, पढ़ाई तुम्हारी किस्मत बदल सकती है।” उस दिन उसे लगा था कि किस्मत कोई ताला है, जिसकी चाबी उसके बस्ते में रखी हुई है। पर अब गाँव की चौपाल में, रिश्तों की बातचीत के बीच, वही ताला किसी और के हाथ में चला गया है—जहाँ चाबी की जगह दहेज की सूचियाँ और ऊँची-नीची जातीय दीवारें खनकती हैं। उसकी आँखों में कभी-कभी एक अजीब-सी रोशनी कौंध जाती है—जब वह पड़ोस की किसी दीदी को कॉलेज जाते देखती है, जो स्कूटी पर बैठकर, किताबों से भरा बैग पीठ पर लटकाए, धूल उड़ाती हुई निकलती है। उस क्षण उसे लगता है कि शायद कहीं कोई रास्ता है, जो उसके घर से भी निकलता है—सिर्फ़ शादी के मंडप तक नहीं, कॉलेज की सीढ़ियों तक भी जाता है। पर अगले ही पल, बगल से गुजरती फुसफुसाहटें—“ज़्यादा पढ़ाओगे तो कौन करेगा शादी?”, “लड़की को इतना खुला मत छोड़ो”—उस रास्ते पर कँटीली झाड़ियाँ उगा देती हैं।
उसके सपने बहुत बड़े नहीं हैं; वह बस इतना चाहती है कि उसके नाम के साथ “कक्षा 10 उत्तीर्ण” लिखने की जगह “बाल-विवाह” की तारीख न जुड़ जाए। वह चाहती है कि उसकी माँ उसे यह कहते हुए देख सके—“मुझे अपने बच्चों को तुमसे ज़्यादा पढ़ाना है।” वह जानती है कि शिक्षित माँ की आँखों में भविष्य का जो उजाला होता है, वह मिट्टी के तेल के दीये में नहीं, बिजली की टिमटिमाती ट्यूब में ही दिखता है। पर इस समय, उसके घर में जलती लौ सिर्फ़ रसोई के चूल्हे में है, जहाँ उसका बचपन रोज़-रोज़ धीमी आँच पर पकता रहता है। गाँव के स्कूल की दीवार पर लिखा है—“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ।” वह रोज़ उस नारे के पास से गुजरती है, जैसे कोई आईना हो जो उसे आधा दिखाता है—बचाई तो गई है, पढ़ाई नहीं गई। उसे लगता है, ये चार शब्द सिर्फ़ दीवार पर नहीं, उसके हृदय पर भी लिखे जाने चाहिए थे—ताकि जब भी कोई उसके हाथ से किताब छीनने आए, तो वह उन्हें ज़ोर से पढ़ सके। पर अभी तो उसकी आवाज़ भी बहुत धीमी है, जैसे कोई बच्चा पहली बार वर्णमाला सीखते समय हकला रहा हो।
और फिर भी, इस सारी धूल और धुएँ के बीच, एक छोटी-सी ज़िद उसमें रोज़ नए सिरे से जन्म लेती है। वह जब पड़ोस की चाची के मोबाइल पर किसी लड़की का भाषण देखती है—जो मंच से कह रही होती है कि “हम भी डॉक्टर, टीचर, अफ़सर बन सकते हैं”—तो उसे लगता है, यह ‘हम’ शब्द उसके लिए भी है, सिर्फ़ शहरों की लड़कियों के लिए नहीं। शायद किसी दिन वह भी किसी फ़ॉर्म पर दस्तख़त करते हुए लिखे—“शैक्षणिक योग्यता: बारहवीं पास”—और उस वक़्त उसके गाँव की हवा में एक अदृश्य, मगर ज़रूरी बदली हुई गंध तैर जाए। उसकी कहानी अकेली नहीं; हर सूबे, हर ज़िले, हर बस्ती में ऐसी अनगिनत आँखें हैं, जो आधा स्कूल और आधा घर देखते-देखते बड़ी हो जाती हैं।
आँकड़ों की फ़ाइलों में उन्हें “ड्रॉपआउट” कहा जाता है, पर सच यह है कि वे खुद नहीं गिरीं, उन्हें धकेला गया—कभी शौचालय की कमी ने, कभी लंबी दूरी ने, कभी घरेलू बोझ ने, कभी बाल-विवाह की रस्मों ने। इन सारी शक्तियों के बीच, वह लड़की अब भी कहीं भीतर से फुसफुसाती है—“मैं गिरना नहीं, उड़ना चाहती थी।” शायद आने वाले समय में कोई एक माँ, कोई एक पिता, किसी एक सुबह सिर्फ़ इतना निर्णय ले ले कि आज बेटी की हथेली पर आटा नहीं, कलम लगेगी; आज उसकी चोटी में सिर्फ़ रिबन नहीं, आत्मविश्वास की पतली-सी डोरी भी बँधेगी। उस दिन गाँव के रास्ते पर एक और लड़की साइकिल से स्कूल जाएगी—धूल उड़ती रहेगी, पर इतिहास की दिशा थोड़ी-सी बदल चुकी होगी। और तब, किसी दीवार पर लिखा नारा पहली बार सच्चाई जैसा लगेगा, सिर्फ़ रंगी हुई पेंटिंग नहीं—“बेटी पढ़ेगी, तभी तो देश आगे बढ़ेगा।”
– प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर (पॉलिटिकल साइंस) कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)







