
यह आलेख श्रीलंका के ऐतिहासिक शहर कैंडी की यात्रा के माध्यम से प्रकृति, संस्कृति और बौद्ध आध्यात्मिकता का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। हर्बल उद्यानों, दलादा मालिगावा, सीलोन टी, कैंडियन नृत्य और मठों की शांति के माध्यम से यह शहर आत्मिक संतुलन का अनुभव कराता है।
- श्रीलंका की सांस्कृतिक आत्मा का शहर
- दलादा मालिगावा और बौद्ध आस्था
- सीलोन टी और पहाड़ियों का सौंदर्य
- कैंडियन नृत्य, मठ और आध्यात्मिक शांति
सत्येन्द्र कुमार पाठक
दुनिया के नक्शे पर ‘हिंद महासागर के मोती’ के रूप में चमकने वाला श्रीलंका अपनी विविधता के लिए विख्यात है। लेकिन यदि आप इस द्वीप राष्ट्र की आत्मा को छूना चाहते हैं, तो आपको इसके मध्य प्रांत की पहाड़ियों में बसे शहर कैंडी की शरण में जाना होगा। 12 जनवरी 2026 की उस अलौकिक अपराह्न, जब मैंने कैंडी की सीमा में प्रवेश किया, तो ऐसा लगा मानो मैं किसी आधुनिक शहर में नहीं, बल्कि इतिहास के एक सुनहरे कालखंड में कदम रख रहा हूँ। समुद्र तल से 465 मीटर की ऊँचाई पर स्थित कैंडी, श्रीलंका के प्राचीन राजाओं की अंतिम राजधानी रही है। आज यह यूनेस्को की विश्व धरोहर है और बौद्ध धर्म का एक वैश्विक केंद्र भी। मेरी यह यात्रा शरीर, स्वाद और आत्मा के तीन ऐसे पड़ावों से गुज़री, जो जीवन भर के लिए स्मृति-पटल पर अंकित हो गए हैं।
Government Advertisement...
प्रकृति का औषधालय और आरोग्य का स्पर्श
कैंडी की यात्रा का श्रीगणेश उन हर्बल वनों और जड़ी-बूटी उद्यानों से हुआ, जिन्हें श्रीलंका का ‘प्राकृतिक औषधालय’ कहा जाता है। शहर के बाहरी घेरे में स्थित इन उद्यानों में सुबह की ओस अभी पत्तियों से ढली भी नहीं थी कि मैं दालचीनी, सफ़ेद चंदन और इलायची की मिश्रित सुगंध से सराबोर हो गया। यहाँ का भ्रमण एक विशेष अनुभव था। स्थानीय विशेषज्ञों ने मुझे उन पौधों से परिचित कराया, जिनका उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यहाँ मैंने सीखा कि कैसे ‘रेड सैंडलवुड’ (लाल चंदन) त्वचा के लिए वरदान है और कैसे ताज़ी कोको की फली से चॉकलेट का सफ़र शुरू होता है। भ्रमण के दौरान एक विशेषज्ञ ने मुझे एक प्राचीन जड़ी-बूटी के अर्क का स्पर्श कराया। उसकी शीतलता और सुगंध ने क्षण भर में यात्रा की सारी थकान हर ली। ये उद्यान केवल व्यापारिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये श्रीलंका की प्राचीन ‘हेला वेदुकाम’ चिकित्सा पद्धति के जीवंत प्रमाण हैं।
श्री दलादा मालिगावा – आस्था का स्वर्ण शिखर
जैसे-जैसे दिन ढला, मैं कैंडी के हृदय स्थल—‘श्री दलादा मालिगावा’ या पवित्र दंत अवशेष मंदिर की ओर बढ़ा। यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि श्रीलंका की राष्ट्रीय अस्मिता का केंद्र है। कैंडी के इस भव्य मंदिर का इतिहास ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से जुड़ा है, जब बुद्ध का पवित्र दाँत भारत के कलिंग से राजकुमारी हेममाला के केशों में छिपकर यहाँ पहुँचा था। 1592 में राजा विमलधर्मसूर्य प्रथम ने यहाँ प्रथम मंदिर बनवाया। बाद के राजाओं, विशेषकर राजा वीर नरेन्द्रसिंघे और अंतिम राजा श्री विक्रम राजसिंघे ने इसे वह भव्यता प्रदान की, जो आज हम देखते हैं। मंदिर की वास्तुकला ‘कैंडियन शैली’ का चरमोत्कर्ष है। मंदिर के चारों ओर बनी ‘बादल दीवार’ (वालाकुलु बम्मा) और अष्टकोणीय मीनार (Pathirippuwa) इसे अन्य मंदिरों से अलग करती है। जब मैं गर्भगृह के सामने खड़ा था, तो सुनहरी छत की चमक और चमेली के फूलों की खुशबू ने एक ऐसा वातावरण बनाया, जहाँ शब्द मौन हो गए और केवल शांति शेष रही।
सीलोन टी – पहाड़ियों की हरी मखमल
कैंडी केवल मंदिरों का ही नहीं, बल्कि उस ‘सीलोन टी’ का भी जन्मस्थान है, जिसने दुनिया की सुबह को ताज़गी दी। 1867 में जेम्स टेलर ने यहीं के लुलकोंडेरा एस्टेट में चाय का पहला पौधा लगाया था। कैंडी के आसपास के चाय बागान ऐसे लगते हैं, मानो पहाड़ियों ने हरे रंग की मखमली चादर ओढ़ ली हो। यहाँ के उत्पादन केंद्रों में जाकर मैंने देखा कि कैसे ‘दो पत्ती और एक कली’ का चयन कर उसे सुखाने, मसलने और किण्वन (Fermentation) की प्रक्रिया से गुज़ारा जाता है। कैंडी की चाय अपनी ‘मिड-ग्रोन’ प्रकृति के कारण कड़क और ताँबे जैसे रंग के लिए जानी जाती है। एक कप ताज़ी चाय की चुस्की लेते हुए पहाड़ियों की धुंध को देखना एक ऐसा अनुभव है, जो आत्मा को तृप्त कर देता है।
कैंडियन नृत्य और सांस्कृतिक धरोहर
शाम होते ही कैंडी की गलियाँ ढोल की थाप से गूँजने लगती हैं। यहाँ का ‘कैंडियन नृत्य’ (Kandyan Dance) श्रीलंका की सांस्कृतिक जीवंतता का प्रतीक है। सफ़ेद वेशभूषा और चाँदी के मुकुट पहने नर्तक जब ‘मयूर नृत्य’ या ‘युद्ध नृत्य’ करते हैं, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। सबसे रोमांचक क्षण वह था, जब नर्तकों ने दहकते अंगारों पर चलकर अपनी मानसिक शक्ति और श्रद्धा का प्रदर्शन किया। यह नृत्य केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक अनुष्ठान है, जो सदियों से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आ रहा है।
मठों की शांति और झील का किनारा
कैंडी का आध्यात्मिक ढाँचा यहाँ के दो प्रमुख मठों—मलवत्तु और असगिरिया—पर टिका है। ये मठ न केवल दंत मंदिर का प्रबंधन करते हैं, बल्कि बौद्ध शिक्षा के महान केंद्र भी हैं। झील के किनारे टहलते हुए, जहाँ एक ओर मठों की सादगी है और दूसरी ओर राजाओं द्वारा निर्मित विशाल झील का जल, मन में एक अद्भुत सामंजस्य का अहसास होता है। पहाड़ी पर स्थित ‘बहु बुद्ध प्रतिमा’ पूरे शहर को अपनी करुणामयी नज़रों से देख रही है। यहाँ आकर अहसास होता है कि क्यों कैंडी को श्रीलंका की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है।
एक स्मृति जो कभी धुँधली नहीं होगी
मेरी एकदिवसीय यात्रा ने मुझे शरीर (हर्बल वनों का आरोग्य), स्वाद (सीलोन टी की महक) और आत्मा (बुद्ध के संदेश) के उन पड़ावों से गुज़ारा, जो जीवन भर के लिए धरोहर बन गए हैं। कैंडी केवल देखने का स्थान नहीं है, यह महसूस करने का स्थान है। यह हमें सिखाता है कि कैसे प्रकृति की गोद में बैठकर हम अपने भीतर की शांति को खोज सकते हैं। कैंडी आज भी इतिहास के उस सुनहरे कालखंड को अपने भीतर संजोए हुए है, जहाँ प्रकृति और परमात्मा का मिलन होता है।
सत्येन्द्र कुमार पाठक
करपी, अरवल, बिहार – 804419 | मो.: 9472987491







