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डॉ. कृष्णा कुमारी के निबंध संग्रह ‘भय बिन होवै प्रीत’ में 31 विचारोत्तेजक निबंधों के माध्यम से प्रेम, सामाजिक मूल्यों और मानवीय संबंधों पर गंभीर विमर्श किया गया है। साहित्यकार सुनील कुमार माथुर ने इसे पाठकों के लिए मार्गदर्शक और चिंतन को प्रेरित करने वाली कृति बताया है।
- डॉ. कृष्णा कुमारी की लेखनी समाज को सोचने पर मजबूर करती है: सुनील कुमार माथुर
- 31 निबंधों में प्रेम, स्वार्थ और परमार्थ का गहन विश्लेषण
- सरल भाषा में गहरे विचार, पाठक को बाँध लेती है कृति
- निबंध छोटे, लेकिन प्रभाव और संदेश अत्यंत व्यापक
- उत्कृष्ट मुद्रण और आकर्षक आवरण के साथ सशक्त सामग्री
जोधपुर। डॉ. कृष्णा कुमारी द्वारा लिखित निबंध संग्रह ‘भय बिन होवै प्रीत’ समकालीन समाज के मूल प्रश्नों को सरल लेकिन प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करने वाली एक महत्वपूर्ण कृति है। इस पुस्तक में कुल 31 निबंध संकलित हैं और प्रत्येक निबंध का शीर्षक अपने नाम की सार्थकता को पूरी तरह उजागर करता है। लेखिका ने हर निबंध में विषय को सटीकता के साथ रखा है, जो न केवल प्रेरणादायक और सारगर्भित है, बल्कि पाठकों को गहराई से सोचने-समझने के लिए बाध्य भी करता है।
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समीक्षक और साहित्यकार सुनील कुमार माथुर के अनुसार, इस निबंध संग्रह में प्रेम विषय को विशेष रूप से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रेम वह तत्व है जो मानवीय संबंधों को मजबूत करता है और रिश्तों को प्रगाढ़ बनाता है, लेकिन वर्तमान समय में जिस तरह प्रेम शब्द का अर्थ विकृत हुआ है, उस पर डॉ. कृष्णा कुमारी ने गहरी और उचित चिंता व्यक्त की है। उनका यह दृष्टिकोण समाज को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
पुस्तक में ‘प्रेम’, ‘स्वाद’, ‘भय बिन होवै प्रीत’, ‘कोई बात नहीं’, ‘बारात: ढूंढते रह जाओगे’, ‘पढ़े-लिखे हैं तो’, ‘स्वार्थ और परमार्थ’, ‘श्रीनाथद्वारा धाम’, ‘कुछ तो लोग’, ‘विश्व मैत्री का संवाहक: बाल साहित्य’ जैसे विविध विषयों पर आधारित निबंध शामिल हैं। इन सभी निबंधों में सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का संतुलित और विवेकपूर्ण प्रस्तुतीकरण देखने को मिलता है।
समीक्षक का कहना है कि भले ही निबंध आकार में छोटे हैं, लेकिन उनका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। प्रत्येक निबंध गहन चिंतन और मनन के योग्य है तथा पाठकों के लिए सच्चे मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। लेखिका ने इस संग्रह की रचना करते समय अपने अनुभव और ज्ञान का भरपूर उपयोग किया है, जिसके कारण यह पुस्तक पाठकों को एक ही बैठक में पूरा पढ़ने के लिए विवश कर देती है।
डॉ. कृष्णा कुमारी हिंदी, राजस्थानी, अंग्रेजी और उर्दू भाषाओं में विभिन्न साहित्यिक विधाओं में निरंतर सृजनरत हैं। उनकी अब तक कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। यह उपलब्धियां उनकी सशक्त लेखनी और आदर्शवादी विचारों का ही परिणाम मानी जाती हैं।
प्रकाशन की दृष्टि से भी ‘भय बिन होवै प्रीत’ एक सुसज्जित पुस्तक है। इसका मूल्य 300 रुपये, कुल 160 पृष्ठ हैं और इसे नीरज बुक सेंटर, दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है। पुस्तक का मुखपृष्ठ आकर्षक है, कागज उच्च गुणवत्ता का है और मुद्रण साफ-सुथरा व सुंदर है। कुल मिलाकर यह निबंध संग्रह साहित्य प्रेमियों और गंभीर पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण और संग्रहणीय कृति के रूप में सामने आता है।








