
यह आलेख भारतीय राजनीति को लोकतंत्र की शक्ति और उसकी समकालीन चुनौतियों के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। जनभागीदारी, समावेशन और संस्थागत मजबूती इसकी बड़ी उपलब्धियाँ हैं, जबकि ध्रुवीकरण, धनबल और गलत सूचना गंभीर चिंताएँ हैं। पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक जागरूकता को मजबूत कर भारतीय लोकतंत्र को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
- भारतीय लोकतंत्र: उपलब्धियाँ, अंतर्विरोध और भविष्य
- भारतीय राजनीति: समावेशन, संवाद और सुधार की जरूरत
- लोकतंत्र के आईने में भारतीय राजनीति
- भारतीय राजनीति की दिशा: शक्ति, जिम्मेदारी और चुनौतियाँ
राज शेखर भट्ट
भारतीय राजनीति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की आत्मा है। विविधताओं से भरे इस देश में राजनीति केवल सत्ता का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और राष्ट्रीय एकता का माध्यम भी है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने की लंबी यात्रा तय की है, परंतु बदलते समय के साथ राजनीति के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी हुई हैं। एक ओर भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनता है। नियमित चुनाव, सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण और बढ़ती राजनीतिक भागीदारी यह दर्शाती है कि लोकतांत्रिक चेतना गहराई से जड़ें जमा चुकी है। स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक, प्रतिनिधित्व का दायरा व्यापक हुआ है।
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महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों की भागीदारी ने राजनीति को अधिक समावेशी बनाया है। दूसरी ओर, राजनीति का बढ़ता ध्रुवीकरण चिंता का विषय है। विचारधारात्मक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन जब वे सामाजिक विभाजन में बदल जाएँ तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ता है। पहचान की राजनीति, धर्म और जाति आधारित ध्रुवीकरण अक्सर विकास और शासन जैसे मूल मुद्दों को पीछे धकेल देता है। परिणामस्वरूप नीतिगत बहस के बजाय आरोप-प्रत्यारोप हावी हो जाते हैं। राजनीति में धन और शक्ति का बढ़ता प्रभाव भी एक गंभीर समस्या है।
चुनावी खर्च, पारदर्शिता की कमी और दलबदल जैसी प्रवृत्तियाँ जनविश्वास को चोट पहुँचाती हैं। राजनीति सेवा का माध्यम बने, इसके लिए नैतिकता और जवाबदेही अनिवार्य है। स्वतंत्र संस्थाओं—चुनाव आयोग, न्यायपालिका, मीडिया—की स्वायत्तता और विश्वसनीयता बनाए रखना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवश्यक है। हाल के वर्षों में शासन की दक्षता, डिजिटल पहल और कल्याणकारी योजनाओं पर जोर बढ़ा है। बुनियादी ढाँचे, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक सुधारों ने विकास की नई संभावनाएँ खोली हैं। हालांकि, विकास तभी टिकाऊ होगा जब वह रोजगार सृजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यावरण संतुलन के साथ आगे बढ़े।
नीति निर्माण में विशेषज्ञता और जनपरामर्श की भूमिका को और सशक्त करने की आवश्यकता है। मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव भी राजनीति को नई दिशा दे रहा है। जहाँ एक ओर यह जनआवाज़ को मंच देता है, वहीं गलत सूचना और उग्र भाषा लोकतांत्रिक संवाद को नुकसान पहुँचा सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का संतुलन समय की मांग है। अंततः भारतीय राजनीति का भविष्य नागरिकों की सक्रियता और विवेक पर निर्भर करता है।
मतदाता के रूप में जागरूकता, सवाल पूछने की संस्कृति और संस्थाओं के प्रति सम्मान लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। राजनीति को व्यक्तिपूजा से निकालकर नीति और परिणामों की कसौटी पर परखना होगा। भारतीय राजनीति में संभावनाएँ अपार हैं। यदि पारदर्शिता, समावेशन और संवाद को प्राथमिकता दी जाए, तो यह न केवल देश के भीतर बल्कि वैश्विक मंच पर भी लोकतंत्र का प्रेरक उदाहरण बन सकती है।
भारतीय राजनीति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की आत्मा है, जिसकी शक्ति जनता की भागीदारी में निहित है। समावेशन, चुनावी प्रक्रिया और संस्थागत मजबूती इसकी प्रमुख उपलब्धियाँ हैं। ध्रुवीकरण, धनबल और गलत सूचना लोकतांत्रिक संवाद के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिक जागरूकता से ही लोकतंत्र को सशक्त बनाया जा सकता है।








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