
इस साक्षात्कार में कथावाचक रामचन्द्र महाराज ने भागवत कथा के आध्यात्मिक महत्व, बच्चों में संस्कारों के अभाव, गाय के धार्मिक-स्वास्थ्यगत मूल्य और आधुनिक खानपान से जुड़ी समस्याओं पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने जीवन में नैतिक मूल्यों, संयम, सहनशीलता और ईश्वर भक्ति को अपनाने का संदेश दिया।
- भागवत कथा का सौभाग्य और मानव जीवन
- बच्चों के बिगड़ते संस्कार और संयुक्त परिवार का टूटना
- गाय का धार्मिक और स्वास्थ्यगत महत्व
- आधुनिक खानपान और घटती आयु पर महाराज का दृष्टिकोण
सुनील कुमार माथुर
साक्षात्कारकर्ता
33, वर्धमान नगर, शोभावतों की ढाणी, खेमे का कुआँ, पाल रोड, जोधपुर, राजस्थान
माथुर : महाराज। प्रायः यह कहा जाता है कि भागवत कथा सुनने का अवसर भाग्यशाली लोगों को ही मिलता है? क्या यह सच है?
महाराज : हाँ, यह बात सोलह आने सही है। प्रायः देखा गया है कि मोहल्ले में, घर के पास या उस क्षेत्र में हमारे आसपास कथा, कीर्तन, भजन संध्या होती है, फिर भी अनेक लोग उस धार्मिक कार्यक्रम से लाभान्वित होने से वंचित रह जाते हैं। जब उनसे इसका कारण पूछा जाता है तो जवाब मिलता है कि तबियत ठीक नहीं थी। जैसे ही कथा में आने के लिए रवाना हुआ कि मेहमान आ गए। कहने का मतलब है कि भागवत कथा रूपी गंगा उनके घर तक आ गई, लेकिन उन्होंने उसमें डूबकी नहीं लगाई, अर्थात कथा सुनने से वंचित रह गए।
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माथुर : महाराज, आज बच्चे शरारती होते जा रहे हैं। इसका क्या कारण है?
महाराज : सबसे बड़ा कारण टूटते संयुक्त परिवार हैं, जिसके कारण बच्चे दादा-दादी व नाना-नानी की छत्रछाया से वंचित हो गए। वहीं दूसरी ओर न शिक्षण संस्थाओं में और न ही माता-पिता बच्चों को आदर्श संस्कार दे पा रहे हैं। यहाँ तक कि नैतिक मूल्यों की सामग्री भी पाठ्यक्रमों से हटा दी गई और संस्कारों के अभाव में वे शरारत ही करेंगे, क्योंकि उन्हें सही-गलत का ज्ञान कराने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं है। अतः अभिभावकगण जब भी धर्म स्थलों पर जाएँ या भजन-कीर्तन, भजन संध्या व भागवत कथा में जाएँ तो अपने साथ बच्चों को अवश्य ही ले जाएँ।
माथुर : कथा के दौरान इतना शांत वातावरण क्यों रहता है?
महाराज : कथा स्थल कोई सामान्य स्थल नहीं होता है। वह भगवान की गोद होती है। जिस प्रकार बच्चे माँ की गोद पाकर शांत हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार कथा स्थल पर आने वाले श्रोता उस परमात्मा की गोद में बैठे होते हैं। यही वजह है कि कथा के दौरान एकदम शांत वातावरण होता है।
माथुर : महाराज, कहते हैं कि गाय को कभी भी लाठी नहीं मारनी चाहिए। ऐसा क्यों?
महाराज : आपका सवाल बहुत ही अच्छा है। गाय को लाठी इसलिए नहीं मारनी चाहिए क्योंकि गाय में देवताओं का वास होता है, इसलिए गाय को कभी भी लाठी से नहीं मारना चाहिए। गाय के गोबर में लक्ष्मी का वास होता है और जिस घर के बाहर गाय गोबर करती है, उस घर में धन की आवक होती है। गाय के महत्व की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि जिसने भी गाय का गोबर अपने हाथ से उठाया, उसे फिर किसी को भी अपना हाथ दिखाने की जरूरत नहीं है और जिसने कभी भी अपने हाथ से गाय का गोबर नहीं उठाया, वह भले ही अपना हाथ किसी को भी दिखा दे, उसके हाथ की रेखाएँ बदलने वाली नहीं हैं। कथावाचक रामचन्द्र महाराज ने बताया कि घर को गोबर से लीपने से घर का वातावरण शुद्ध होता है। पहले गोबर के कंडे की राख से बर्तन मांजे जाते थे, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम था, लेकिन आज हम आधुनिकता के नाम पर केमिकलयुक्त घोल व साबुन से बर्तन धो रहे हैं, जिसके कारण हमारे शरीर में केमिकल जा रहा है और हम बीमार हो रहे हैं।
माथुर : महाराज, आज इंसान इतनी कम आयु में ही कैसे परलोक सिधार रहा है? इसका क्या कारण है?
महाराज : हमारे शरीर में जो हार्ड है, वह काफी मजबूत है और उसकी आयु 150 वर्ष की है, लेकिन हम हैं कि पिज्जा व बर्गर खा-खा कर उसे कमजोर कर रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देकर बताया कि अगर आप पेट्रोल की गाड़ी में डीजल डालकर गाड़ी चलाओगे तो उस गाड़ी का इंजन बहुत ही जल्दी खराब हो जाएगा। ठीक उसी प्रकार पिज्जा व बर्गर खाएँगे तो हार्ड समय से पहले ही कमजोर हो जाएगा व आप बीमार पड़ जाएँगे। अतः जहाँ तक संभव हो बंद पैकिंग की चीजों का कम ही सेवन करें और हो सके तो न खाएँ, यही स्वास्थ्य के लिए बेहतर होगा। लेकिन आज का इंसान जो सामने मिला, उठाकर खा लिया और कहते हैं कि चलती का नाम ही गाड़ी है। यही सबसे बड़ी समस्या है।
माथुर : आप जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं?
महाराज : मैं तो समस्त देशवासियों को यही कहना चाहता हूँ कि वे अपने जीवन में नैतिक मूल्यों को बनाए रखें और सभी के साथ प्रेम, स्नेह, मिलनसारिता का भाव बनाए रखें। जीवन में संयम, धैर्य, सहनशीलता, त्याग की भावना, अहिंसा के मार्ग पर चलें और अपने से बड़े व बुजुर्गों का मान-सम्मान करें तथा सभी के साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा आप दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं एवं दिन में कम से कम एक बार अपने परिजनों के साथ बैठकर भोजन अवश्य ही करें। इसी के साथ-साथ कुछ समय ईश्वर भक्ति के लिए भी निकालें और धार्मिक कार्यक्रम में अवश्य शामिल हों। इससे पूजा-अर्चना के प्रति आपकी आस्था बनी रहेगी।








