
यह आलेख बच्चों को मोबाइल की लत से दूर रखने के लिए बाल साहित्य सृजन और बाल पत्रिकाओं की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है। साथ ही ‘चहल-पहल’ ऑनलाइन बाल पत्रिका की सामग्री, रचनात्मकता और बच्चों के सर्वांगीण विकास में उसकी उपयोगिता को रेखांकित करता है।
- मोबाइल युग में बाल साहित्य की प्रासंगिकता
- बच्चों के सर्वांगीण विकास में बाल पत्रिकाओं की भूमिका
- चहल-पहल बाल पत्रिका: रचनात्मकता का सशक्त माध्यम
- बाल साहित्य से बच्चों को मोबाइल से दूर रखने की पहल
जोधपुर। बच्चों को मोबाइल से दूर रखने के लिए बाल साहित्य सृजन और बाल पत्रिकाओं के प्रकाशन की नितांत आवश्यकता है। यह उद्गार अणुव्रत लेखक मंच के सदस्य व साहित्यकार सुनील कुमार माथुर ने ऑनलाइन बाल पत्रिका चहल-पहल की समीक्षा करते हुए व्यक्त किए।
माथुर ने कहा कि बच्चों को मोबाइल की लत से छुटकारा दिलाने के लिए समय-समय पर लोग लंबे-चौड़े व्याख्यान दे देते हैं, लेकिन बाल साहित्य सृजन और बाल पत्रिकाएँ बच्चों तक नहीं पहुँच पा रही हैं, जिसके कारण उनका सर्वांगीण विकास नहीं हो पा रहा है।
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माथुर ने कहा कि चहल-पहल पत्रिका भले ही 26 पृष्ठों की है, लेकिन इसमें बाल कहानियाँ, कविताएँ, बाल पहेलियाँ, भूल-भुलैया, दुनिया के देश जैसी ढेरों सामग्री चित्रमय रूप में दी गई है। इसी के साथ बच्चों को प्रोत्साहन देने के लिए ‘बच्चों का कोना’ के तहत बच्चों की पेंटिंग प्रकाशित कर उन्हें पूरा प्रोत्साहन दिया गया है। यह पत्रिका बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक सिद्ध होगी।







