
बदरीनाथ धाम में माइनस 12 डिग्री सेल्सियस तापमान और भारी बर्फबारी के बीच एक साधु की कठिन तपस्या का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। खुले आसमान के नीचे हो रही यह साधना लोगों को चकित कर रही है और देवभूमि की प्राचीन आध्यात्मिक परंपरा को उजागर कर रही है। कपाट बंद होने की अवधि में विशेष अनुमति से साधु-संत यहां तप में लीन रहते हैं।
- कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे साधना
- कपाट बंद होने के बावजूद जारी आध्यात्मिक तप
- हिमालय की बर्फ में आस्था की अद्भुत मिसाल
- विशेष अनुमति लेकर साधु-संत कर रहे शीतकालीन साधना
बदरीनाथ। भू-बैकुंठ बदरीनाथ धाम इन दिनों आस्था, तप और अडिग विश्वास का जीवंत उदाहरण बना हुआ है। हिमालय की गोद में बसे इस पावन धाम में जब मंगलवार को भारी बर्फबारी हुई और तापमान माइनस 12 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला गया, तब भी एक साधु खुले आसमान के नीचे कठिन तपस्या में लीन दिखाई दिए। इसी साधना का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो रहा है और लोगों के मन में श्रद्धा के साथ-साथ विस्मय भी जगा रहा है।
कड़ाके की ठंड, चारों ओर बर्फ की मोटी परत और शून्य से नीचे गिरता तापमान — ऐसी विषम परिस्थितियों में सामान्य जीवन की कल्पना भी कठिन होती है, लेकिन साधु की यह साधना हिमालयी आध्यात्मिक परंपरा की गहराई को दर्शाती है। वायरल वीडियो में साधु पूर्ण एकाग्रता के साथ ध्यानस्थ अवस्था में दिखाई दे रहे हैं, मानो बाहरी कष्ट उनके लिए कोई मायने ही न रखते हों। शीतकाल में बदरीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं, लेकिन मोक्ष, आत्मशुद्धि और ईश्वर की आराधना के उद्देश्य से कुछ साधु-संत प्रशासन से विशेष अनुमति लेकर यहां प्रवास करते हैं।
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प्रशासन द्वारा पुलिस सत्यापन के बाद ही उन्हें धाम में ठहरने की अनुमति दी जाती है। वर्तमान में लगभग 15 साधु-संत यहां शीतकालीन तपस्या कर रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कपाट बंद रहने की अवधि में बदरी विशाल के धाम में की गई तपस्या का विशेष फल प्राप्त होता है। स्कंद पुराण के केदारखंड में भी उल्लेख मिलता है कि इस अवधि में भगवान नारायण की पूजा स्वयं देवताओं द्वारा की जाती है, जिनमें नारद को देव प्रतिनिधि पुजारी माना गया है।
यही गहरी आस्था साधकों को बर्फ से ढकी इस देवभूमि में डटे रहने की अद्भुत शक्ति देती है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष बदरीनाथ धाम के कपाट 23 अप्रैल को सुबह 6:15 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोले जाएंगे, जबकि भगवान बदरी विशाल के अभिषेक में प्रयुक्त होने वाले तिलों के तेल की पिराई 7 अप्रैल को संपन्न होगी। तब तक यह पावन धाम साधु-संतों की तपस्या और मौन साधना का साक्षी बना रहेगा।





