
यह आलेख लेखन को आत्म-सुधार और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम मानता है। लेखक का विचार है कि विचारधारा पर लिखने से पहले स्वयं में बदलाव आवश्यक है, क्योंकि वास्तविक सुधार आत्मचिंतन और कर्म से ही संभव होता है।
- लेखन का उद्देश्य: ज्ञान नहीं, परिवर्तन
- विचार, कर्म और आत्म-सुधार
- सामाजिक समरसता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी
- राम का आदर्श और कृष्ण की व्यवहारिकता
आशी प्रतिभा
जीवन में सिर्फ ज्ञान बाँटने के लिए नहीं लिखना चाहिए, हमें बदलाव के लिए भी लिखना चाहिए और यह बदलाव स्वयं से ही प्रारंभ हो। नवीन रचनाएँ लिखना हमें सृजनात्मक एवं कलात्मक बनाता है, परंतु वैचारिक रूप से लिखने पर हमें जीवन स्पष्टता से समझ में आने लगता है। कई चीज़ों को हम मूलतः मना नहीं कर पाते या सीधे “न” नहीं कह पाते, परंतु उसका प्रभाव कभी-न-कभी हम पर ही पड़ता है। जिस कार्य को हम अच्छी तरह कर नहीं सकते, उसे हमें केवल किसी को दिखाने के लिए नहीं करना चाहिए। कहने का अर्थ यह है कि हमें किसी और के लिए नहीं, अपितु अपने दृष्टिकोण को सटीक रखते हुए, स्वयं में ही सुधार लाना चाहिए।
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कई लोग सामाजिक भेदभाव पर लिखते हैं, परंतु क्या वे स्वयं उस भेदभाव को नहीं करते? पहले हमें यह भेदभाव स्वयं से मिटाना चाहिए, तभी हम सामाजिक रूप से कह सकेंगे कि हम भेदभाव नहीं करते। परंतु आज कुछ सामाजिक विषय ऐसे हैं, जहाँ सामाजिक समरसता की जगह जाति-परिवर्तन एवं भेदभाव ने कट्टर रूप ले लिया है, जो मानवीय भावनाओं के लिए अत्यंत दुखद है।
एक आम व्यक्ति सबसे पहले अपनी आजीविका को चुनता है। जाति और समाज से पहले उसका कर्म ही उसे जीवन जीने के लिए आवश्यक होता है। किसी भी धर्म या जाति का होने के बाद भी मनुष्य को जीवन हेतु अपने व्यवसाय और कर्म पर निर्भर रहना पड़ता है। रोटी, कपड़ा और मकान इंसान की प्रथम आवश्यकता हैं। जब हम धर्म का चयन करते हैं, तब सनातन धर्म के अनुसार भी मानवता ही मनुष्य जाति के लिए सबसे बड़ा धर्म है।
आज हमें राम के पदचिह्नों पर चलने की आवश्यकता है, क्योंकि वे एक आदर्श हैं; परंतु इस समाज में रहने के लिए हमें कृष्ण बनना ही होगा। यह एक सतत यात्रा है, जो आदर्श सिखाती है, परंतु जीवन के उतार-चढ़ाव में कृष्ण की भाँति हर परिस्थिति को संभालने की शक्ति भी देती है।
@आशी प्रतिभा (स्वतंत्र लेखिका)
ग्वालियर, मध्य प्रदेश, भारत






