
यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन को शब्द, विचार, सत्ता और राष्ट्रसेवा के समन्वय के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ कविता, राजनीति और मर्यादा एक-दूसरे से अभिन्न हो जाती हैं। अटल एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक युग के प्रतीक हैं, जिनकी नेतृत्वशीलता, लोकतांत्रिक मूल्य और राष्ट्रभक्ति आज भी भारत की चेतना को दिशा देती है।
रूपेश कुमार
चैनपुर, सीवान, बिहार
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ग्वालियर की पावन भूमि से
उठा एक स्वर, नाम था अटल,
जिसकी वाणी में वेदों की गूँज,
जिसका मन था पर्वत-सा अडिग, अचल।
बालक नहीं, भविष्य था वह,
संस्कारों में भारत की शान,
पिता ने दिया ज्ञान का दीप,
माँ ने सौंपा राष्ट्र का मान।
कलम चली तो कविता जागी,
शब्दों में सच्चाई का तेज,
राजनीति आई तो सेवा बनी,
निज स्वार्थ से कोसों दूर वह वेग।
विचार टकराए, मतभेद हुए,
पर मर्यादा की सीमा न टूटी,
शत्रु भी जिसके शिष्टाचार से
सम्मान की भाषा ही बूटी।
जनसंघ से संसद की सीढ़ी तक
संघर्षों ने पग-पग आज़माया,
हारा नहीं जो हार में भी,
हर पराजय से भविष्य रचाया।
“हार नहीं मानूँगा” यह पंक्ति
उस पुरुष की आत्मा थी,
विपक्ष में रहकर भी जिसने
लोकतंत्र की लौ जलाए रखी।
तीन बार सिंहासन मिला उसे,
पर सिंहासन उस पर न चढ़ा,
सत्ता सिर झुकाती थी उसके आगे,
वह जनता के चरणों में खड़ा।
पोखरण की गर्जना ने बताया,
भारत अब निर्बल नहीं,
शांति चाहता है, युद्ध नहीं,
पर आत्मसम्मान पर समझौता नहीं।
लाहौर तक चली मैत्री-बस,
सीमा लांघती मानवता की ध्वनि,
“बातचीत से निकलेगा समाधान,”
यह अटल की विश्व-वाणी बनी।
कारगिल की रणभूमि साक्षी बनी,
संयम, शौर्य और नीति का मेल,
विजय भी मिली, मर्यादा भी बची,
यही राजधर्म का अंतिम खेल।
सड़कें, संचार, शिक्षा, विकास,
भारत को जोड़े नए सूत्र,
राज्यों की रचना में भी दिखी
उस दृष्टा की दूरगामी दृष्टि अमूर्त।
कवि अंत तक जीवित रहा,
सत्ता भी कविता से हारी,
“मौत से ठन गई” लिखने वाला
आशा की मशाल रहा, अविचल, भारी।
सम्मान मिले, शिखर मिले,
भारत-रत्न भी चरणों में आया,
पर सबसे बड़ा सम्मान वही था,
जो जन-हृदय में अटल ने पाया।
आज 101वीं जयंती पर
भारत गर्व से करता उद्घोष,
एक व्यक्ति नहीं, एक युग थे आप, अटल जी!
राष्ट्र आपको करता कोटि-कोटि नमन, जयघोष।









