
यह आलेख आलोचना, रिश्तों की संवेदनशीलता, जीवन की थकान और सकारात्मक सोच के महत्व पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है। लेखक ने धैर्य, सहनशीलता, आत्मविश्वास और निरंतर आत्मविकास को जीवन की सफलता और सामाजिक योगदान का मूल आधार बताया है।
- आलोचना: पीड़ा नहीं, आत्मशुद्धि का माध्यम
- रिश्तों की उम्र और अहंकार का प्रभाव
- थकान, हिम्मत और सकारात्मक दृष्टिकोण
- समय, प्रतिभा और स्वयं को निखारने की सीख
सुनील कुमार माथुर
एक-दूसरे की आलोचना करना व्यक्ति की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। अनेक लोग ऐसे हैं जो जब तक एक-दूसरे की आलोचना न कर लें, तब तक उन्हें रोटी हजम नहीं होती। आलोचना करने वाले यह भी जानते हैं कि इससे उन्हें कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है, लेकिन वे जब तक आलोचना न करें, तब तक उनका मन बेचैन रहता है। मन में मरोड़ें उठती हैं। लेकिन हमारे बड़े-बुज़ुर्गों का कहना है कि अपनी आलोचना को धैर्यपूर्वक सुनना चाहिए, क्योंकि यह हमारी ज़िंदगी का मैल हटाने में साबुन का काम करती है। अर्थात कभी-कभार आलोचनाएँ हमारा सही मार्गदर्शन भी करती हैं और हम समय रहते अपनी गलती सुधार सकते हैं तथा उपेक्षा का शिकार होने से बच सकते हैं।
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कहते हैं कि रिश्तों की भी अपनी एक उम्र होती है। कुछ रिश्ते मरते दम तक चलते हैं और कुछ जीते-जी मर जाते हैं। रिश्तों की यह उम्र हम पर निर्भर करती है कि हम कैसा व्यवहार करते हैं। यदि हम सभी के साथ प्रेमपूर्वक समान व्यवहार करें और हमारे भीतर सहनशीलता, सहनशक्ति, धैर्य, त्याग और संयम की भावना हो, तो वे रिश्ते पीढ़ियों तक चलते हैं। लेकिन जब हमारे भीतर अहंकार का भाव आ जाता है, तब मधुर से भी मधुर रिश्ते हमारे जीवनकाल में ही दम तोड़ देते हैं।
कभी-कभी इंसान न टूटता है, न बिखरता है—बस थक जाता है। कभी खुद से, कभी किस्मत से और कभी अपनों से। इसलिए जब आप स्वयं को थका हुआ महसूस करें, तब हिम्मत मत हारिए और शांत भाव से सकारात्मक सोच के साथ धीरे-धीरे कार्य करते रहिए। जब आपकी सोच सकारात्मक होगी, तब आपके सभी कार्य बिना बाधा के निर्बाध रूप से पूर्ण होंगे, क्योंकि जिसकी सोच सकारात्मक होती है, उसके साथ ईश्वर हर वक्त रहता है।
जीवन में कोई भी कमजोर नहीं होता, बस “वक्त-वक्त” की बात होती है। बारी सबकी आती है। इसलिए समय के साथ चलें और स्वयं को हर वक्त अपडेट रखें—यही जीवन की सच्चाई है। हर व्यक्ति में एक अनोखी प्रतिभा और हुनर होता है। अतः उसे अपने अनोखे अंदाज़ से निखारिए, ताकि आपकी प्रतिभा से समाज के अन्य लोग भी लाभान्वित हो सकें। कहा भी जाता है कि सबकी ज़िंदगी के पेपर अलग होते हैं, इसलिए नकल न करें और समाज व राष्ट्र को कुछ नया देने के लिए सदैव प्रयासरत रहें।
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार, जोधपुर, राजस्थान








