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अलकनंदा घाटी में वैज्ञानिकों को ऐसे प्रमाण मिले हैं जो बताते हैं कि बदरीनाथ क्षेत्र में अतीत में कई भीषण मेगाफ्लड आई थीं। ल्यूमिनेसेंस डेटिंग तकनीक से मिले कंकड़ों और तलछट की परतों ने हिमालयी आपदाओं की पुरानी कहानी खोल दी है।
- सरस्वती नदी किनारे 20 मीटर ऊंचाई तक जमा पत्थरों ने खोले रहस्य
- ल्यूमिनेसेंस बुरियल डेटिंग तकनीक से उजागर हुआ हजारों साल का भू-इतिहास
- माणा गांव के पास 40 मीटर मोटी तलछट परत ने दिखाए झील टूटने के प्रमाण
- झील फटने जैसी घटनाओं को समझने में शोध देगा भविष्य के लिए चेतावनी संकेत
देहरादून | हिमालय की ऊंची चोटियों और गहरी घाटियों के बीच दबी अनकही कहानियों को विज्ञानियों ने एक बार फिर उजागर किया है। आईआईटी कानपुर और बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने अलकनंदा घाटी में ऐसे भू-साक्ष्य खोज निकाले हैं जो साबित करते हैं कि इस क्षेत्र में अतीत में कई भीषण और अत्यंत वेग वाली बाढ़ें—मेगाफ्लड—आई थीं। यह शोध बदरीनाथ क्षेत्र में सरस्वती नदी के किनारे किए गए विस्तृत भू-अध्ययन पर आधारित है और इसे वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान में आयोजित छठी राष्ट्रीय ल्यूमिनेसेंस डेटिंग एंड इट्स एप्लिकेशन कार्यशाला में प्रस्तुत किया गया।
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अध्ययन में विज्ञानियों ने सरस्वती नदी के तट पर लगभग 20 मीटर ऊंचाई तक जमा विशाल पत्थरों, चिकने गोल कंकड़ों, महीन बालू-बजरी और तलछट परतों का विश्लेषण किया। माणा गांव के पास करीब 40 मीटर मोटी तलछट परत में 3–30 सेंटीमीटर आकार के चिकने कंकड़ों और ऊपरी हिस्से में झील की तलछट के प्रमाण मिले। यह साफ संकेत है कि सामान्य नदी बाढ़ इतनी ऊंचाई तक भारी बोल्डर नहीं चढ़ा सकती। इसके पीछे केवल एक घटना संभव है—झील के अचानक टूटने से उत्पन्न विशाल और अत्यंत शक्तिशाली बाढ़।
शोधकर्ताओं के अनुसार, अतीत में एक बड़े राक एवलांच (चट्टानी हिमस्खलन) ने सरस्वती नदी का रास्ता रोका और घाटी में एक विशाल अस्थायी झील बन गई। समय बीतने के बाद जब यह झील अचानक टूटी, तो उसने अपने साथ भारी मात्रा में बोल्डर, कंकड़ और महीन तलछट को कई किलोमीटर नीचे तक बहा दिया। यह घटना लगभग उसी प्रकृति की थी जैसी आजकल देखने को मिलने वाली जीएलओएफ (ग्लेशियल लेक आउटब्रस्ट फ्लड) होती है। इस ऐतिहासिक रहस्य को खोलने में ल्यूमिनेसेंस बुरियल डेटिंग तकनीक ने बड़ी भूमिका निभाई। यह तकनीक पहली बार बड़े कंकड़ों पर प्रयोग की गई। नदी में बहते समय कंकड़ों की सतह सूर्यप्रकाश में रहती है, जिससे उनका ल्यूमिनेसेंस सिग्नल मिट जाता है।
लेकिन जब वे अचानक बाढ़ में बहकर किसी स्थान पर दब जाते हैं, तो गहराई के अनुसार सिग्नल पुनः भरना शुरू होता है। विज्ञानियों ने इसी संकेत का विश्लेषण कर यह समझा कि ये कंकड़ कब दफ्न हुए और किस प्रकार की बाढ़ ने उन्हें वहां पहुंचाया। हालांकि शोध का कालखंड फिलहाल “लेट क्वार्टनरी”—यानी पिछले लगभग एक लाख वर्षों की अवधि—तक सीमित रखा गया है, पर यह भी संकेत मिलता है कि हिमालय में इस तरह की कई विशाल बाढ़ें अभी भी ऐतिहासिक रूप से दर्ज नहीं हैं। वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी में भी झील के टूटने का तत्व प्रमुख था, जो इस अध्ययन को आधुनिक चेतावनी प्रणालियों और आपदा प्रबंधन के लिहाज से और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन नीति-निर्माताओं को भविष्य के लिए तैयार करने में मदद करेगा। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने और झीलों के अस्थिर होने के बीच यह शोध आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने की मजबूत नींव प्रदान करता है।





