
यह कविता होली के रंगों के माध्यम से प्रेम, भाईचारे और मानवता का संदेश देती है। कवि समाज से राग-द्वेष और भेदभाव मिटाकर खुशहाली, एकता और सद्भाव फैलाने का आह्वान करता है।
- होली के रंगों में प्रेम और मानवता
- रंगों का पर्व और एकता का संदेश
- अबीर-गुलाल से फैले खुशियों की बहार
- होली: प्रेम, सद्भाव और खुशहाली का उत्सव
भुवन बिष्ट
रानीखेत (उत्तराखंड)
होली के रंग अबीर से, हम आओ बाँटें मन का प्यार।
खुशहाली आए जग में, अब आया रंगों का त्यौहार।
रंगभरी पिचकारी से अब, सब धोएँ राग-द्वेष का मैल।
ऊँच-नीच की हो न भावना, उड़े अबीर लाल गुलाल।
होली के हुड़दंग में भी, आओ बाँटें मानवता का प्यार।
खुशहाली आए जग में, अब आया रंगों का त्यौहार।
होली के रंग अबीर से, हम आओ बाँटें मन का प्यार।
गुजिया मिठाई की मिठास से, फैले खुशियों की बहार।
आओ रंगों की पिचकारी से, धोएँ जग का अत्याचार।
होली के रंग अबीर से, हम आओ बाँटें मन का प्यार।
खुशहाली आए जग में, अब आया रंगों का त्यौहार।
बसंत बहार के रंगों से, ओढ़े धरती बनकर पीतांबरी।
ईर्ष्या, राग-द्वेष को त्यागें, हम सींचें मानवता की क्यारी।
रूठे श्याम को भी मनाएँ, आओ रंगों से खुशियाँ फैलाएँ।
रंगों और पानी से सीखें सब, झलक एकता की दिखलाएँ।
अब मानवता का हो संचार, बहे सुख-समृद्धि की धार।
होली के रंग अबीर से, हम आओ बाँटें मन का प्यार।
खुशहाली आए जग में, अब आया रंगों का त्यौहार।।









