
सुनील कुमार माथुर
हम किस प्रकार के आधुनिक समाज में जी रहे हैं—यह समझ से परे है। हर व्यक्ति अपनी ही धुन में जी रहा है। किसी को किसी की चिंता नहीं। यदि कोई किसी को टोके तो तुरंत मारपीट, गाली-गलौज, हिंसा और आगजनी का दृश्य देखने को मिल जाता है। संयम, धैर्य, सहनशीलता, त्याग, समझदारी और कानून-कायदों को एक ओर रखकर लोग आधुनिकता के नाम पर मनमानी कर रहे हैं, जो बिल्कुल उचित नहीं है।
आधुनिकता के नाम पर युवा वर्ग खाली सड़कों पर भी तेज आवाज में बिना कारण हॉर्न बजाकर दूसरों को परेशानी में डाल रहा है। इसी प्रकार यदि किसी के घर विवाह, जन्मदिन या भक्ति संध्या जैसे कार्यक्रम हो रहे हों तो वे बिना सोचे-समझे तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाते हैं। उस समय उन्हें यह ध्यान नहीं रहता कि कोई वृद्ध या बीमार व्यक्ति सो रहा है, बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं या आसपास के लोगों को असुविधा हो रही है।
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वे इन सब की अनदेखी कर केवल अपने मनोरंजन, अपने मित्रों–रिश्तेदारों को प्रभावित करने और मोहल्ले में अपनी शान का प्रदर्शन करने में ही गर्व महसूस करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि यह जंगल नहीं बल्कि आवासीय कॉलोनी है, जहाँ हर व्यक्ति को शांति से जीने का अधिकार है। और जब कोई आपत्ति करता है तो सरल-सा उत्तर मिलता है—”एक दिन में क्या फर्क पड़ता है?”
लेकिन फर्क तो पड़ता है। यह बात उनसे पूछिए जो एक मिनट देर से स्टेशन पहुंचते हैं और देखते हैं कि अभी-अभी ट्रेन निकल गई। जिसका गला प्यास से सूख रहा हो, सड़क पर तड़प रहे किसी व्यक्ति से पूछिए। या फिर स्वयं अनुभव कीजिए जब आपके घर या प्रतिष्ठान के पास कोई तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाए—तभी समझ आता है कि शोर कितना असहनीय होता है।
आधुनिकता के नाम पर यह कैसा शोर–शराबा? यदि आयोजन जरूरी भी हो तो बिना माइक के भी वह शानदार तरीके से किया जा सकता है। आधुनिकता का अर्थ लोक-दिखावा नहीं है। अगर हम थोड़ी संवेदनशीलता और समझदारी अपनाएँ तो समाज अधिक शांत, संयत और सुंदर बन सकता है।
लेखक:
सुनील कुमार माथुर
सदस्य, अणुव्रत लेखक मंच
स्वतंत्र लेखक व पत्रकार
जोधपुर, राजस्थान








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