
मुनस्यारी (पिथौरागढ़)। उत्तराखंड पंचायत चुनाव की तैयारी में जुटे मतदान कर्मियों को इस बार प्रकृति और बुनियादी ढांचे की कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है। सीमांत जिले के दुर्गम और बारिश से प्रभावित इलाकों में मतदान केंद्रों तक पहुंचना जानलेवा साबित हो रहा है। मंगलवार को मुनस्यारी विकासखंड के एक बूथ पर जाते समय खड़ी चढ़ाई चढ़ते हुए एक मतदान कर्मी की हार्ट अटैक से मौत हो गई, जबकि दूसरे बूथ की ओर बढ़ रहे पीठासीन अधिकारी का फिसलने से पैर टूट गया।
खड़ी चढ़ाई चढ़ते समय गिर पड़े मतदान कर्मी
राज्य के 80 में से 32 आईटीआई में इस साल से दोहरी प्रशिक्षण प्रणाली की नई व्यवस्था शुरू होने जा रही है। इसी क्रम में मुनस्यारी विकासखंड के प्राथमिक विद्यालय गोल्फा में बनाए गए मतदान केंद्र पर तैनाती के लिए मंगलवार सुबह वरिष्ठ सहायक मनीष पंत (44), जो सीएमओ कार्यालय में कार्यरत थे, अपने दल के साथ रवाना हुए। उन्होंने सड़क मार्ग से एक सीमा तक की दूरी तय की, लेकिन उसके बाद पोलिंग बूथ तक पहुंचने के लिए उन्हें चार किलोमीटर की खड़ी पहाड़ी चढ़ाई पार करनी थी। चढ़ाई के दौरान उन्हें अचानक सीने में तेज दर्द हुआ और वे वहीं गिर पड़े। साथी कर्मियों ने उन्हें होश में लाने की कोशिश की, लेकिन कुछ ही देर में उनकी मौत हो गई।
सूचना मिलते ही प्रशासन ने रेस्क्यू टीम रवाना की, जिसने उनके शव को नीचे लाने की व्यवस्था की। मनीष पंत की असामयिक मृत्यु ने न केवल उनके परिवार, बल्कि समूचे विभाग में शोक की लहर दौड़ा दी है। उनकी जगह तत्काल एक अन्य कर्मचारी को पोलिंग ड्यूटी पर भेजा गया।
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फिसलन भरे रास्ते ने पीठासीन अधिकारी को पहुंचाया अस्पताल
इसी दिन एक अन्य घटना में पीठासीन अधिकारी गौरव कुमार, जो भैंसकोट बूथ पर मतदान कराने जा रहे थे, बदहाल रास्ते पर फिसलकर बुरी तरह गिर गए। उन्हें गंभीर चोटें आईं और उनके पैर में फ्रैक्चर हो गया। टीम के अन्य सदस्यों ने किसी तरह उन्हें नाचनी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया, जहां से उन्हें पिथौरागढ़ जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। उनकी जगह भी एक अन्य अधिकारी को मतदान केंद्र भेजा गया।
प्राकृतिक बाधाओं के बीच लोकतंत्र का जतन
बारिश के चलते सीमांत इलाकों में सड़कें जगह-जगह से बंद हैं और कई रास्ते पूरी तरह से टूट चुके हैं। बावजूद इसके, मतदान कर्मी जोखिम उठाकर समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। जिला निर्वाचन अधिकारी और संबंधित आरओ ने भी इन घटनाओं की पुष्टि की है और कहा है कि प्रशासन रेस्क्यू व सहयोग के लिए पूरी तरह सतर्क है।
सवाल उठते हैं व्यवस्थाओं पर
इन घटनाओं ने एक बार फिर उत्तराखंड के दुर्गम क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की खस्ता हालत और चुनावी व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसी स्थिति में यह जरूरी हो जाता है कि भविष्य में दुर्गम इलाकों के मतदान केंद्रों के लिए विशेष सुरक्षा और स्वास्थ्य प्रबंधन किया जाए ताकि जान जोखिम में डालकर लोकतंत्र को ज़िंदा रखने वाले कर्मियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।





