
मो. मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर
सखी
जब जब
आवेला चुनाव देश में,
धरकेला करेजवा सबका
जाने का होई अबकी देश में?
पूर्व के अनुभव कहत बा
भीतर भीतर सब बुझत बा
नेता लोग त
हमहीं जीतब हमहीं जीतब कहत बा!
लगावतारे दुअरा रोज दउड़!
जीतला पर करतारे कुछ अउर!
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पिछला वादा पड़ गई ल बा
उनका के भोर
याद दियवला पर देखतारे कहीं और
मुस्ताकातारे!
घड़ी घड़ी दांत चियारें,
कहें अबकी भर करीं हमपे विस्वास
पूरा क देम अबकी
रउआ सभन के आस!
सखी
केकरा पर कइल जाव विश्वास?
केहू आवे दुअरा पर खाए
केहू आवै फोटो खिंचाए
ओकरे रही रही खबरीया बनाए
एही सब जुमला से जनता के रिझाए?
सखी जब जब देसवा में चुनाव आए
नेता लोग ऐसहीं जनता के पट्टी पढ़ाए?
धरकाए करेजवा
सपना जगाए
जीतते सब भूल जाएं
एगो विकासवा सगरो भुनावल जाए?
सभे डींगे
जीतत अपना के बताए
कोई बीस करोड़ नौकरी दिलाए
तो कोई पुराना पेंशन ले आए
बाद बाकी छूछहीं रोटी खिलाए
कहे तलो पकौड़ा
मारो हथौड़ा
आत्मनिर्भर बन जाओ
सरकार से मत कोई आस लगाए
घड़ी-घड़ी सब जुमला दे बताय!
शिक्षा स्वास्थ्य भुलाए
बेचने मेडिकल इंश्योरेन्स
रेल टेलीफोन ठेके पर दे आए?
पहिलहू से दुर्दिन ले आए
अपने जीत के जहजिया उड़ाए
जनता के खाली धूलिया फंकाए
आपस में हमके लड़ाए
जब जब सखी देश में चुनाव आए
लोकतंत्र शर्म से छुप जाए
कभो हिंदू आ मुस्लिम
कहीं बीच में मस्जिद मंदिर आ जाए
कभी अगड़ा पिछड़ा में उलझाए
दंगा करा के नेताजी गंगा में नहाएं
अपने खातिर बिल्डिंग विशाल बनाएं
सखी जब जब चुनाव देस में आए
मनवा भीतरे भीतर डेराए ।
जाने कब सुधरीहें नेता देसवा के
लीहें सुधि गरीब दुखिया के
जाने कब जगीहें जनता भी ?
बिना बंटे वोट देने जाएं
तब सचमुच नेता देश में विकास ले आएं
आई सड़क बिजली स्कूलिया आपन गांव में,
मुस्कैहें बेटियां सुरक्षा पैहें घर में गांव में।
तब ई सपना पूरा होई
गांव में तभी केहू ना दुखिया होई!
का! ठीक कहतानी नू??
त हां में हां मिलइह,
एकजुट हो वोटवा देवे जइह!
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »मो. मंजूर आलम ‘नवाब मंजूरलेखक एवं कविAddress »सलेमपुर, छपरा (बिहार)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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