- दिवाली पर उल्लुओं के अवैध शिकार की आशंका, वन विभाग ने बढ़ाई निगरानी
- उल्लू, कछुआ और दोमुंहे सांप से जुड़े अंधविश्वास, वन्यजीवों की सुरक्षा पर जोर
- धन पाने की मान्यता के चलते वन्यजीवों पर खतरा, अधिकारियों को निर्देश जारी
- उत्तराखंड में दिवाली से पहले वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए वन विभाग सतर्क
देहरादून। दिवाली नजदीक आने के साथ ही वन्यजीवों के अवैध शिकार और तस्करी की आशंका को देखते हुए उत्तराखंड वन विभाग सतर्क हो गया है। उल्लू की पूजा से धन-संपदा बढ़ने जैसे अंधविश्वास के कारण त्योहार के आसपास उल्लुओं को पकड़ने और अवैध रूप से उनका कारोबार किए जाने का खतरा रहता है। इसे देखते हुए वन मुख्यालय ने वनाधिकारियों को निगरानी बढ़ाने और संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष सतर्कता बरतने के निर्देश दिए हैं। प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव नीना ग्रेवाल ने सभी संबंधित निदेशकों और प्रभागीय वनाधिकारियों (डीएफओ) को पत्र जारी किया है। इसमें उल्लुओं और अन्य निशाचर वन्यजीवों की मौजूदगी वाले क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने के साथ गश्त बढ़ाने और जरूरी सुरक्षा उपाय करने को कहा गया है।
उल्लू की पूजा से धन बढ़ने का अंधविश्वास
कुछ लोगों में यह अंधविश्वास प्रचलित है कि दिवाली के दौरान उल्लू से जुड़ी पूजा करने से धन-संपदा में वृद्धि होती है। इसी मान्यता के चलते कुछ लोग उल्लू हासिल करने के लिए बड़ी रकम देने को तैयार हो जाते हैं। ऐसी मांग वन्यजीवों के अवैध शिकार, उन्हें पकड़कर रखने और उनकी तस्करी का कारण बन सकती है। वन्यजीवों का इस तरह इस्तेमाल न केवल उनके संरक्षण के लिए खतरा है, बल्कि वन्यजीवों से जुड़े कानूनों के उल्लंघन की आशंका भी पैदा करता है। इसी को ध्यान में रखते हुए वन विभाग ने अधिकारियों को सतर्क रहने और उल्लुओं के साथ दूसरे निशाचर जीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।
साढ़े चार साल में 13 जीवित उल्लू बरामद होने का रिकॉर्ड
वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के एसोसिएट डायरेक्टर टीटो जोसेफ के अनुसार, संस्था के पास उपलब्ध रिकॉर्ड में साढ़े चार साल की अवधि के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से 13 जीवित उल्लू बरामद किए जाने का उल्लेख है। यह आंकड़ा संस्था के उपलब्ध रिकॉर्ड पर आधारित है। इससे देशभर में उल्लुओं की तस्करी की कुल संख्या का आकलन नहीं किया जा सकता, लेकिन यह वन्यजीवों को पकड़ने और अवैध कारोबार से जुड़े मामलों की मौजूदगी की ओर ध्यान दिलाता है।
कछुओं और दोमुंहे सांप को लेकर भी अंधविश्वास
वन्यजीवों से जुड़े अंधविश्वास केवल उल्लुओं तक सीमित नहीं हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञ विपुल मौर्य के मुताबिक, कुछ खास तरह के कछुओं की पूजा करने से धन बढ़ने की मान्यता भी प्रचलित है। इसी तरह रेड सैंड बोआ नामक सांप को लेकर भी यह भ्रांति है कि इसे अपने पास रखने से धन-संपदा की कमी नहीं होती। रेड सैंड बोआ को आम बोलचाल में दोमुंहा सांप कहा जाता है। इस मान्यता के कारण भी इसके अवैध कारोबार का खतरा बना रहता है।
समाचार में उल्लेखित एक पुराने मामले के अनुसार, वर्ष 2013 में हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के पास तस्करों से ऐसा सांप पकड़ा गया था। विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता बढ़ने और वन विभाग की कार्रवाई से वन्यजीवों से जुड़े अंधविश्वासों के प्रभाव में कमी आई है, लेकिन इनके आधार पर वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने की आशंका पूरी तरह नजरअंदाज नहीं की जा सकती।
बाघ और तेंदुए के नाखून-दांत को लेकर भी भ्रांतियां
कुछ लोगों में यह धारणा भी है कि बाघ या तेंदुए के नाखून और दांत पहनने से डर दूर हो जाता है या व्यक्ति को विशेष शक्ति मिलती है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ इन मान्यताओं को निराधार बताते हैं। वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया के उत्तराखंड के सीनियर फील्ड ऑफिसर राजेंद्र अग्रवाल के अनुसार, ऐसी मान्यताओं का कोई आधार नहीं है। इस तरह के अंधविश्वास वन्यजीवों के अंगों की मांग बढ़ा सकते हैं, जिससे अवैध शिकार और कारोबार को बढ़ावा मिलने का खतरा रहता है।
त्योहार के दौरान निगरानी और जागरूकता जरूरी
दिवाली के दौरान वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए निगरानी के साथ-साथ जनजागरूकता भी जरूरी है। उल्लू, कछुए, सांप या अन्य वन्यजीवों को धन-संपदा से जोड़ने वाली मान्यताओं के आधार पर उन्हें पकड़ना, खरीदना या बेचना उनके अस्तित्व के लिए नुकसानदायक हो सकता है। वन विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों में सतर्कता बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। ऐसे में त्योहार के दौरान वन्यजीवों के अवैध शिकार और तस्करी पर रोक लगाने के लिए विभागीय निगरानी तथा आम लोगों का सहयोग महत्वपूर्ण रहेगा।
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