- भीड़ नहीं, तथ्यों से बदलाव
- आंदोलन में सच और विवेक
- नारों से नहीं, कर्मों से पहचान
- जनहित के लिए सत्य की आवाज़
डॉ. सत्यवान सौरभ
आंदोलन का अर्थ है, जनहित का उत्थान।
निज स्वार्थों की भीड़ से, कैसे बने महान॥
भीड़ बढ़ाने से नहीं, बदलेंगे हालात।
नीयत, कर्मों, नीति से, बनती अच्छी बात॥
भीड़ देखकर मत करो, सच का तुम अनुमान।
झूठ हमेशा जीतता, जब सोता इंसान॥
सत्ता से सवाल करो, रखना अपना पक्ष।
तथ्यों से जो बात हो, उसका ही है अक्ष॥
नारे देकर हर घड़ी, मत समझो अभियान।
जनहित में जो काम हो, उससे हो पहचान॥
कुर्सी खातिर जो करें, नफरत का व्यापार।
उनसे कैसे हो सके, जनता का उद्धार॥
सच बोलो तो तर्क दो, रखो विचार प्रमाण।
बिना तथ्य के शोर से, घटता अपना मान॥
भीड़ जुटाकर चल पड़े, लेकर झूठी शान।
सच की आँधी खोलती, भीतर का इंसान॥
विरोध करो तो इस तरह, जनहित की हो बात।
नफरत की दीवार से, बिखर न जाए साथ॥
मर्यादा हो शब्द में, तर्कों में हो धार।
सच के आगे टिक सके, कहाँ कोई दरबार॥
जनता की पीड़ा लिए, निकले जो आवाज़।
सेवा से पहचान हो, तभी बने सरताज॥
झूठी खबरें बाँटकर, मत भड़काओ आग।
सत्य छिपाकर कब भला, मिटते जन के दाग॥
कुर्सी के हित में करें, सच का रोज़ शिकार।
ऐसे लोगों से भला, कैसे हो उद्धार॥
विरोध वह सार्थक है, जिसमें हो विवेक।
तथ्य की कसौटी बिना, दावा है सब फ़ेक॥
नफरत की भाषा छोड़कर, सच का करो प्रचार।
जनता के हित में उठें, आवाज़ें दमदार॥
कर्म बताएगा सदा, किसका कैसा ज्ञान।
भीड़ नहीं पहचान है, सेवा से सम्मान॥
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पैनलिस्ट
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संपादकीय टिप्पणी: कविता के मूल भाव और छंदात्मक शैली को बनाए रखा गया है। कुछ स्थानों पर भाषा एवं व्याकरण के छोटे सुधार किए गए हैं।



