कविता नन्दिनी की यह ग़ज़ल जीवन के दर्द, टूटे दिल की पीड़ा, सच के साथ खड़े रहने की चुनौती और बदलते समय की विडंबनाओं को अभिव्यक्त करती है। इसमें रिश्तों की कसक, मजहबी सोच के नाम पर सच से भटकाने की प्रवृत्ति और जीवन से निराश लोगों की मनोदशा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। ग़ज़ल की पंक्तियाँ पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती हैं और जीवन की वास्तविकताओं से रूबरू कराती हैं।
- ज़िंदगी के दर्द की दास्तान
- सच की राह और ज़माने के सवाल
- आईना पूछता है वो सूरत कहाँ
- दर्द को भूलने में ज़माने लगे
कविता नन्दिनी
सिविल लाइंस, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
दर्द आँखों में फिर मुस्कुराने लगे,
आज फिर से हमें आज़माने लगे।।
चोट खाए हुए दिल से मत पूछिए,
दर्द को भूलने में ज़माने लगे।।
इन हवाओं ने कुछ तो कहा है कहीं,
घोंसले फिर परिंदे बनाने लगे।।
जब कभी हमने सच का सहारा लिया,
लोग मज़हब हमें फिर सिखाने लगे।।
आईना पूछता है वो सूरत कहाँ,
उम्र क्या आप हमसे छुपाने लगे।।
ज़िंदगी के सताए हुए लोग हैं,
मौत को जो गले से लगाने लगे।।
‘नन्दिनी’ ज़िंदगी जिसने देखी नहीं,
वह इसे ख़ूबसूरत बताने लगे।।



