उत्तराखंड में घटते जल प्रवाह से जूझ रहे 4660 प्राकृतिक जलस्रोतों को उपचार के लिए चिह्नित किया गया है। इनमें 1174 जलस्रोत ऐसे हैं, जहां पानी का प्रवाह 20 प्रतिशत से भी कम दर्ज किया गया है। जलस्रोतों के पुनर्जीवन के लिए जलसंग्रहण क्षेत्रों में संरक्षण कार्य ग्रामीणों की भागीदारी के साथ चरणबद्ध तरीके से किए जा रहे हैं।
- 1174 नौले-धारों में 20 प्रतिशत से भी कम पानी
- उत्तराखंड में सूखते जलस्रोतों के संरक्षण की तैयारी
- 4660 नौले-धारे और अन्य जलस्रोत उपचार के लिए चिह्नित
- पानी बचाने को पहाड़ में जलस्रोतों के पुनर्जीवन पर जोर
देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक जलस्रोतों के घटते जल प्रवाह और इससे पैदा हो रहे पेयजल संकट को देखते हुए जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन की दिशा में काम तेज किया जा रहा है। प्रदेशभर में ऐसे 4660 प्राकृतिक जलस्रोत चिह्नित किए गए हैं, जिन्हें उपचार और संरक्षण की आवश्यकता है। इनमें नौले, धारे, गदेरे, नदियां और तालाब शामिल हैं। स्प्रिंग एंड रिवर रिज्युविनेशन अथारिटी (सारा) की ओर से चिह्नित इन जलस्रोतों को उनकी स्थिति और जल प्रवाह के आधार पर प्राथमिकता देते हुए उपचारित करने की कार्ययोजना तैयार की जा रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1174 जलस्रोत ऐसे हैं, जिनमें पानी का प्रवाह 20 प्रतिशत से भी कम रह गया है। इसके अलावा 1314 जलस्रोतों में जल प्रवाह 21 से 40 प्रतिशत, 1045 में 41 से 60 प्रतिशत, 639 में 61 से 80 प्रतिशत और 405 जलस्रोतों में 81 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया है। 83 जलस्रोत अन्य श्रेणी में रखे गए हैं।
ग्रामीणों की भागीदारी से हुआ चिह्नीकरण
जलस्रोतों के संरक्षण की इस मुहिम में स्थानीय ग्रामीणों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ‘धारा मेरा, नौला मेरा, गांव मेरा, प्रयास मेरा’ थीम के तहत ग्रामीणों के सहयोग से भगीरथ एप के माध्यम से प्राकृतिक जलस्रोतों का चिह्नीकरण किया गया। इस प्रक्रिया में ऐसे जलस्रोतों की पहचान की गई, जहां समय के साथ जल प्रवाह में कमी आई है और जिनके संरक्षण की आवश्यकता महसूस की जा रही है। चिह्नित जलस्रोतों के उपचार के लिए केवल स्रोत के आसपास काम करने के बजाय उनके जलसंग्रहण क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके तहत जल संरक्षण, वर्षाजल संचयन और जलस्रोतों को रिचार्ज करने से जुड़े कार्य किए जाने की योजना है, ताकि जलस्रोतों में प्राकृतिक रूप से पानी का प्रवाह बढ़ाया जा सके और उनका दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित हो।
50 जलस्रोतों पर काम शुरू
सारा की एसीईओ कहकशां नसीम के अनुसार चिह्नित जलस्रोतों की स्थिति, उनके जलसंग्रहण क्षेत्र और वर्तमान जल प्रवाह का आकलन करते हुए प्राथमिकता के आधार पर कार्ययोजनाएं तैयार की जा रही हैं। इसी क्रम में गरुड़ गंगा और जटा गंगा नदियों के सहायक नौले-धारों सहित करीब 50 जलस्रोतों में संरक्षण और पुनर्जीवन से जुड़े कार्य शुरू किए जा चुके हैं। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में नौले और धारे लंबे समय से ग्रामीण क्षेत्रों की पेयजल व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। ऐसे में इनके जल प्रवाह में कमी को ग्रामीण आबादी के लिए महत्वपूर्ण चुनौती माना जा रहा है। जलस्रोतों के पुनर्जीवन के लिए जलसंग्रहण क्षेत्रों में किए जाने वाले संरक्षण कार्यों से इन स्रोतों की जलधारण क्षमता और प्राकृतिक रिचार्ज प्रक्रिया को मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा।
कई जिलों में बड़ी संख्या में जलस्रोत चिह्नित
प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्राकृतिक जलस्रोतों की स्थिति अलग-अलग है। टिहरी में 453 धारे, 106 नौले, 115 गदेरे और पांच नदियां चिह्नित की गई हैं। पौड़ी में 310 धारे, 166 नौले, 178 गदेरे और छह नदियां चिह्नित हैं। चमोली में 267 धारे, 78 नौले, 71 गदेरे, पांच नदियां और एक तालाब शामिल है। पिथौरागढ़ में 237 धारे, 183 नौले, 98 गदेरे और नौ नदियां चिह्नित की गई हैं, जबकि देहरादून में 223 धारे, 92 नौले, 122 गदेरे और 43 नदियां इस सूची में शामिल हैं। अल्मोड़ा में नौलों की संख्या 369 दर्ज की गई है। नैनीताल में 115 नौले, चंपावत में 106 और पौड़ी में 166 नौले चिह्नित किए गए हैं। आंकड़े बताते हैं कि प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण केवल पेयजल संकट से निपटने का उपाय नहीं है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में पारंपरिक जल व्यवस्था और ग्रामीण जीवन को बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में चिह्नित जलस्रोतों और उनके जलसंग्रहण क्षेत्रों में किए जाने वाले कार्यों की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संरक्षण कार्य कितनी निरंतरता और स्थानीय भागीदारी के साथ आगे बढ़ते हैं।


1 thought on “उत्तराखंड के 4660 जलस्रोतों को पुनर्जीवन का इंतजार”