
मो.मंजूर आलम उर्फ नवाब मंजूर
पाषाण रोज रोज नहीं बनते
यूं ही पाषाण इसे नहीं कहते
बनने में वर्ष करोड़ों लगते
गर्मी सर्दी धूप बारिश
सदियों तक सहते
सहते वजन टन हजार
फिर तपकर दबकर
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बनते कठोर
फिर कहते सब हमें पाषाण
पाषाण बनना नहीं आसान!
और तुम सब हमें कह
पाषाण हृदयवाला!
दूर जाते हो
नजरें चुराते हो
पहले सच्चाई से हो वाकिफ
क्यूं मैंने पाषाणाई को चुना?
क्यूं सर सदियों अपना धुना?
पाषाण बनना कोई खेल नहीं है
प्रकिया को जब समझोगे
तप दब कर
मार मौसमों की सहोगे
फिर भूल से भी ना कहोगे
पाषाण हृदयवाला
देखो कितने प्यार से लगाते हो पाषाण
घरों में अपने?
स्वर्ग से सजाते हो
देख इसकी सुंदरता इठलाते हो!
मुझे भी गले लगाकर देखो
कर से कर मिलाकर देखो
इस पाषाण को पाकर देखो
जिंदगी संवर जाएगी
तुम्हारी नाराजगी कहीं दूर चली जाएगी
सिर्फ सुंदरता और सादगी रह जाएगी।
¤ प्रकाशन परिचय ¤
![]() | From »मो. मंजूर आलम ‘नवाब मंजूरलेखक एवं कविAddress »सलेमपुर, छपरा (बिहार)Publisher »देवभूमि समाचार, देहरादून (उत्तराखण्ड) |
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