
सूचना अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी न मिलने पर अपीलकर्ता ने द्वितीय अपील दायर की है। लोक सूचना अधिकारी और विभागीय अधिकारियों पर भ्रामक व अपूर्ण उत्तर देने के आरोप लगे हैं। मामले में पारदर्शिता, नियमों के पालन और दंडात्मक कार्रवाई की मांग उठाई गई है।
- आरटीआई में टकराव: सूचना न देने पर विभाग घिरा, द्वितीय अपील दाखिल
- पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह: सूचना अधिकारी के जवाबों से बढ़ा विवाद
- सूचना अधिकार बना संघर्ष: अपूर्ण जवाबों के खिलाफ आयोग पहुंचा मामला
- विज्ञापन नियमों से लेकर फाइल नोटिंग तक, हर बिंदु पर उठे सवाल
- आरटीआई में देरी और भ्रमित जवाब: अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग
राज शेखर भट्ट
देहरादून। सूचना के अधिकार अधिनियम-2005 के तहत पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना एवं लोक संपर्क विभाग से जुड़ा एक मामला सामने आया है, जिसमें अपीलकर्ता द्वारा मांगी गई सूचनाएं समय पर और सही रूप में उपलब्ध न कराए जाने का आरोप लगाया गया है। अपीलकर्ता के अनुसार, उन्होंने महानिदेशक, सूचना एवं लोक संपर्क विभाग को 08 अक्टूबर 2025, 13 अक्टूबर 2025, 24 अक्टूबर 2025, 30 अक्टूबर 2025 और 19 नवम्बर 2025 को विभिन्न विषयों पर कार्यवाही के लिए पत्र प्रेषित किए थे। इन पत्रों की सत्यापित प्रतियां भी उपलब्ध हैं। इसके बाद 26 नवम्बर 2025 को सूचना अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन कर इन पत्रों पर हुई कार्यवाही का विवरण और संबंधित दस्तावेजों की प्रतिलिपि मांगी गई।
आरोप है कि लोक सूचना अधिकारी द्वारा 16 दिसम्बर 2025 को दिया गया उत्तर अपूर्ण, अस्पष्ट और भ्रामक था। मांगी गई वास्तविक सूचना—जैसे प्रमाणित प्रतियां, फाइल नोटिंग, डायरी/रजिस्टर प्रविष्टि और कार्यवाही विवरण—उपलब्ध नहीं कराए गए। अपीलकर्ता का कहना है कि बिंदु संख्या 01 से 05 तक दिए गए उत्तर इतने अस्पष्ट थे कि उनके आधार पर सूचना प्राप्त करना संभव नहीं था, जबकि आवेदन में किसी प्रकार का ‘अनुमान’ शामिल नहीं था। मामले को लेकर लोक सूचना अधिकारी से व्यक्तिगत मुलाकात भी की गई, जहां कथित तौर पर यह कहा गया कि वे आवेदन का विश्लेषण या व्याख्या नहीं कर सकते और संबंधित प्रभाग से सूचना मंगवाकर ही उपलब्ध कराएंगे। अपीलकर्ता का तर्क है कि सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 5(4) के तहत अधिकारी अन्य अधिकारियों से सहायता लेने के लिए बाध्य हैं, लेकिन यहां इसका समुचित पालन नहीं किया गया।
असंतोषजनक उत्तर के बाद 22 दिसम्बर 2025 को प्रथम अपील दायर की गई। 16 जनवरी 2026 को सुनवाई हुई, लेकिन अपीलकर्ता के अनुसार प्रथम अपीलीय अधिकारी ने सूचना को निशुल्क देने के बजाय सशुल्क उपलब्ध कराने का आदेश दिया, जो कि अधिनियम की धारा 7(6) के विपरीत है। नियम के अनुसार 30 दिनों में सूचना न मिलने पर आगे दी जाने वाली सूचना निःशुल्क होनी चाहिए। अपीलकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि विभाग ने बार-बार आवेदन के बिंदुओं को बदलकर उत्तर दिया और वास्तविक विषय से भटकाया। यहां तक कि कुछ मामलों में पत्रों की उपलब्धता से ही इनकार कर दिया गया, जबकि वे विभाग में जमा किए जा चुके थे या सीएम पोर्टल के माध्यम से भेजे गए थे।
विशेष रूप से विज्ञापन वितरण से जुड़े मामलों में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं। अपीलकर्ता के अनुसार, गैर-सूचीबद्ध समाचार पत्रों और बिना पंजीयन प्रमाण पत्र वाले प्रकाशनों को लाखों रुपये के विज्ञापन दिए गए, जबकि संबंधित नियमों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। विभागीय अधिकारियों द्वारा ‘फोन के आधार पर विज्ञापन देने’ और ‘निजी दर तय करने’ जैसे कथित बयान भी सवालों के घेरे में हैं। मामले में यह भी सामने आया कि अलग-अलग अधिकारियों द्वारा एक ही विषय पर विरोधाभासी जवाब दिए गए—कहीं कहा गया कि सूचना सीएम पोर्टल से दी जा चुकी है, तो कहीं दावा किया गया कि सूचना आरटीआई के माध्यम से पहले ही उपलब्ध कराई जा चुकी है।
आवेदन से द्वितीय अपील तक के सभी सवाल-जवाब और पत्र-
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इन परिस्थितियों में अपीलकर्ता ने सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर करते हुए कई गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनमें सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 2(एफ), 2(जे), 4(1)(सी), 5(4), 7(1) और 19(1) के उल्लंघन शामिल हैं। साथ ही, संबंधित अधिकारियों पर जानबूझकर सूचना न देने, भ्रामक उत्तर देने और प्रथम अपील आदेश की अवहेलना करने के आरोप लगाए गए हैं। अपीलकर्ता ने आयोग से मांग की है कि सभी बिंदुओं पर विस्तृत सुनवाई कर स्पष्ट आदेश जारी किए जाएं, मांगी गई समस्त सूचना प्रमाणित रूप में उपलब्ध कराई जाए, दोषी अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए तथा धारा 19(8)(ई) के तहत हुए मानसिक, आर्थिक और प्रशासनिक कष्ट के लिए उचित क्षतिपूर्ति प्रदान की जाए।
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की सूचना प्राप्ति के अधिकार से जुड़ा है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और सूचना के अधिकार की प्रभावशीलता पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। अब देखना होगा कि सूचना आयोग इस पूरे प्रकरण पर क्या रुख अपनाता है और क्या इससे व्यवस्था में सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।






सूचना का अधिकार में नियमानुसार सूचना देना विभाग का दायित्व है जिसे प्रतिष्ठा का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए ।