
2014 में नए भारत के वादों के साथ बनी सरकार के एक दशक के कार्यकाल में कई उपलब्धियों के साथ कुछ विवाद और आलोचनाएं भी सामने आईं। नोटबंदी, जीएसटी और कुछ आर्थिक-राजनीतिक मामलों को लेकर सरकार की नीतियों पर सवाल उठे। ऐसे में लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और नीतियों की निरंतर समीक्षा आवश्यक मानी जाती है।
- नए भारत के वादे और उम्मीदें
- नोटबंदी और जीएसटी पर उठे सवाल
- राजनीतिक विवाद और जवाबदेही की मांग
- लोकतंत्र में आलोचना और सुधार की जरूरत
राज शेखर भट्ट
साल 2014 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनी, तब देश के सामने “नए भारत” का सपना रखा गया था। भ्रष्टाचार-मुक्त शासन, तेज आर्थिक विकास और पारदर्शिता का वादा किया गया। लेकिन एक दशक के करीब समय बीत जाने के बाद कई ऐसे मुद्दे सामने आए हैं, जिन्होंने सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सबसे पहले बात अर्थव्यवस्था की करें तो सरकार ने बड़े-बड़े सुधारों का दावा किया। 2016 में लागू की गई नोटबंदी को काले धन के खिलाफ निर्णायक कदम बताया गया था। लेकिन बाद में कई आर्थिक विशेषज्ञों ने इसे अर्थव्यवस्था के लिए झटका माना। छोटे उद्योगों, व्यापारियों और असंगठित क्षेत्र पर इसका गहरा असर पड़ा और रोजगार पर भी नकारात्मक प्रभाव देखने को मिला।
इसके बाद 2017 में लागू किया गया वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) भी शुरुआती वर्षों में काफी अव्यवस्था का कारण बना। जटिल नियमों और बार-बार बदलते प्रावधानों ने छोटे कारोबारियों को मुश्किल में डाल दिया। सरकार ने इसे “एक देश, एक कर” का बड़ा सुधार बताया, लेकिन इसका लाभ आम व्यापारियों तक आसानी से नहीं पहुंच पाया। सरकार की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषकों का आरोप है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में केंद्रीकरण बढ़ गया है और संस्थानों की स्वायत्तता कम हुई है। कई मामलों में संसद में पर्याप्त बहस के बिना महत्वपूर्ण कानून पारित किए गए, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भी चर्चा छिड़ी।
विवादों की बात करें तो हाल के वर्षों में कुछ बड़े आर्थिक और राजनीतिक मामलों ने सरकार को असहज स्थिति में डाला। उदाहरण के लिए, 2023 में हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद अडानी समूह को लेकर उठे सवालों ने संसद से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक चर्चा पैदा कर दी। विपक्ष ने इस मामले में सरकार से जवाबदेही की मांग की, हालांकि सरकार ने इन आरोपों को राजनीतिक बताया। इसके अलावा विपक्ष ने जांच एजेंसियों के इस्तेमाल को लेकर भी सरकार की आलोचना की है। उनका कहना है कि राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ एजेंसियों का इस्तेमाल बढ़ा है। सरकार इस आरोप को सिरे से खारिज करती रही है और कहती है कि कानून अपना काम कर रहा है।
यह भी सच है कि सरकार ने कई योजनाएं शुरू की हैं और आधारभूत ढांचे पर निवेश बढ़ाया है। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की नीतियों और फैसलों की आलोचनात्मक समीक्षा भी उतनी ही जरूरी है। सवाल यह नहीं है कि सरकार ने कुछ किया या नहीं किया, बल्कि यह है कि जो वादे किए गए थे, क्या वे पूरी तरह पूरे हुए? आज जब देश 21वीं सदी में तेजी से आगे बढ़ने का दावा कर रहा है, तब पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। यही किसी भी मजबूत लोकतंत्र की असली पहचान भी होती है।







