
यह कविता एक नन्हे बच्चे के खेल और सपनों की मासूम दुनिया को दर्शाती है। सड़क को मैदान बनाकर खेलता छोटा खिलाड़ी अपने आत्मविश्वास और खुशी से जीवन का सच्चा आनंद दिखाता है। रचना बचपन की ऊर्जा, कल्पना और उमंग का सुंदर चित्रण करती है।
- नीले बल्ले संग छोटे सपनों का मैदान
- सड़क बना मैदान, खेल बना पहचान
- बचपन की हँसी और सपनों का खेल
- नन्हे कदमों में छुपा बड़ा हौसला
डॉ. सत्यवान सौरभ
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नन्हे हाथ में नीला बल्ला,
आँखों में सपनों का हल्ला।
सड़क बनी है आज मैदान,
खेल रहा है छोटा शैतान।।
बैटमैन वाली प्यारी शान,
जैसे आया कोई महान।
गेंद गिरी है पास कहीं,
हिम्मत इसकी कम न हुई।।
हँसी छुपी है होठों में,
खुशी बसी है कदमों में।
बचपन बोले—खेल ही खेल,
यही तो जीवन का है मेल।।
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक हैं।)
डॉ. सत्यवान सौरभ
कवि, सामाजिक विचारक एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पैनलिस्ट,
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन, बड़वा (सिवानी), भिवानी, हरियाणा









