
बॉम्बे हाई कोर्ट ने संगीतकार-निर्माता पलाश मुच्छल की मानहानि याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्माता विज्ञान माने को कथित आपत्तिजनक बयान देने से अंतरिम रूप से रोक दिया है। अदालत ने कहा कि बिना प्रमाण के सार्वजनिक आरोप किसी की प्रतिष्ठा को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकते हैं। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च 2026 को होगी।
- 10 करोड़ के मानहानि दावे पर कोर्ट सख्त
- बिना सबूत आरोपों पर लगाई रोक, दो हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश
- सोशल मीडिया बयानबाजी पर हाई कोर्ट की सख्ती
- पलाश मुच्छल ने फाइनेंशियल फ्रॉड आरोपों को बताया झूठा
मुम्बई। मानहानि मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए फिल्म निर्माता विज्ञान माने को संगीतकार और फिल्ममेकर पलाश मुच्छल के खिलाफ किसी भी प्रकार के कथित मानहानिकारक बयान देने से रोक दिया है। अदालत ने यह अंतरिम आदेश मामले की गंभीरता को देखते हुए पारित किया। यह विवाद तब सामने आया जब माने ने मुच्छल पर लगभग 40 लाख रुपये के कथित वित्तीय लेनदेन को लेकर आरोप लगाए। उन्होंने सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर यह दावा किया कि मुच्छल ने उनसे धनराशि ली और वापस नहीं की।
साथ ही, उन्होंने मुच्छल के निजी जीवन से जुड़े कुछ आरोप भी सार्वजनिक रूप से लगाए। इन आरोपों का खंडन करते हुए पलाश मुच्छल ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और इसे उनकी छवि और करियर को नुकसान पहुंचाने की साजिश बताया। उनके वकील ने दलील दी कि बिना ठोस साक्ष्य के लगाए गए आरोपों से न केवल उनकी पेशेवर साख प्रभावित हो रही है, बल्कि उन्हें मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि यदि ऐसे बयानों पर रोक नहीं लगाई गई तो इससे अपूरणीय क्षति हो सकती है।
Government Advertisement...
अदालत ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को बिना आधार के नुकसान पहुंचाया जाए। कोर्ट ने विज्ञान माने को निर्देश दिया है कि वे किसी भी मंच—चाहे वह सोशल मीडिया हो या अन्य सार्वजनिक प्लेटफॉर्म—पर पलाश मुच्छल के खिलाफ कोई भी अपुष्ट या आपत्तिजनक बयान जारी न करें। साथ ही, माने को दो सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया है।
पलाश मुच्छल ने इस मामले में 10 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग भी की है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च 2026 को निर्धारित की है, जहां दोनों पक्षों की दलीलों पर आगे विचार किया जाएगा। यह आदेश फिल्म उद्योग और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि बिना प्रमाण के लगाए गए आरोपों पर न्यायालय सख्त रुख अपना सकता है।






