
उत्तराखंड में शिक्षकों को सीधे मताधिकार देने की मांग पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने शासन से जवाब तलब किया है। प्रवक्ता डॉ अंकित जोशी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने शिक्षा और कार्मिक विभाग से शपथपत्र मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
- डेलीगेट व्यवस्था को चुनौती, हाईकोर्ट में याचिका
- प्रवक्ता डॉ अंकित जोशी की याचिका पर सुनवाई
- शिक्षा सचिव व निदेशक से शपथपत्र मांगा
- 13 अप्रैल को होगी मामले की अगली सुनवाई
देहरादून। राज्य में शिक्षकों को सीधे मताधिकार दिए जाने के मुद्दे ने अब न्यायिक रूप ले लिया है। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने इस प्रकरण में सचिव विद्यालयी शिक्षा, सचिव कार्मिक और निदेशक माध्यमिक शिक्षा से शपथपत्र के साथ जवाब दाखिल करने को कहा है। यह याचिका राजकीय शिक्षक संघ के सदस्य एवं प्रवक्ता डॉ अंकित जोशी द्वारा दायर की गई है। उन्होंने वर्तमान डेलीगेट प्रणाली को लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध बताते हुए सभी शिक्षकों को प्रत्यक्ष मतदान का अधिकार देने की मांग की है।
डेलीगेट व्यवस्था पर आपत्ति
याचिकाकर्ता का तर्क है कि संघ का प्रत्येक सदस्य समान अधिकारों का अधिकारी है। ऐसे में चुनाव प्रक्रिया में भी सभी सदस्यों को सीधे मतदान का अवसर मिलना चाहिए। उनका कहना है कि किसी शिक्षक को मतदान से वंचित रखना समानता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। डॉ जोशी ने बताया कि उन्होंने इस विषय में पहले सचिव विद्यालयी शिक्षा, सचिव कार्मिक और निदेशक माध्यमिक शिक्षा को औपचारिक प्रत्यावेदन भी दिया था, लेकिन समयबद्ध समाधान न मिलने के कारण उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
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कोर्ट का निर्देश और अगली सुनवाई
13 फरवरी 2026 को हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने संबंधित विभागों के साथ राजकीय शिक्षक संघ को भी प्रत्युत्तर शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी पक्षों का जवाब प्राप्त होने के बाद मामले की विस्तृत सुनवाई की जाएगी। प्रकरण की अगली सुनवाई 13 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
लोकतांत्रिक अधिकारों की बहस तेज
इस मामले ने राज्य में शिक्षकों के संगठनात्मक ढांचे और चुनावी प्रक्रिया को लेकर नई बहस छेड़ दी है। यदि अदालत शिक्षकों के पक्ष में फैसला देती है तो संघ की चुनाव प्रणाली में व्यापक बदलाव संभव है। शिक्षक संगठनों के भीतर भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है और कई सदस्य प्रत्यक्ष मताधिकार के समर्थन में खुलकर सामने आ रहे हैं। अब सभी की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि राज्य के शिक्षकों को सीधे मतदान का अधिकार मिलेगा या नहीं।
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