
यह कविता माँ के निस्वार्थ प्रेम और त्याग की भावनात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें माँ अपने बच्चे से आग्रह करती है कि वह बचपन के स्नेह और किए गए त्याग को कभी न भूले। रचना ममता, कर्तव्य और समय के चक्र की गहरी सीख देती है।
- माँ का निस्वार्थ स्नेह
- ममता की अमिट पुकार
- संतान से माँ की विनती
- बुढ़ापे का सहारा बनो
सैनिक की कलम
गणपत लाल उदय, अजमेर, राजस्थान
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मेरे अंश, मेरे ख़ून तुम याद सदा ही रखना रे,
तुम बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे।
तेरे जन्म के खातिर कोई मंदिर न छोड़ा रे,
मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारों के भी चक्कर काटे रे।।
तेरे लिए राज दुलारे क्या-क्या दुःख झेले रे,
तुम बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे।
नौ माह तुझे ख़ून से सींचा, तब जग देखा रे,
बुढ़ापे की रोटी का हो तुम ही एक सहारा रे।।
पाल-पोस तुझे बड़ा कर शादी तेरी रचाई रे,
तुम बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे।
मुँह का निवाला तुझको खिलाया, लोरी सुनाई रे,
भूखी-प्यासी स्वयं रहकर तुझे दूध पिलाई रे।।
खोल अपने दिल के नयन फिर तू सोचना रे,
तुम बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे।
धूम-धाम से शादी रचा दी, बच्चे तेरे हो गए रे,
प्यार जैसे उनसे करता, ख़्याल मेरा रखना रे।।
समय बड़ा बलवान है, रखना माँ पर ध्यान रे,
तुम बचपन का प्यार मेरा भूल नहीं जाना रे।
जैसा बोया वैसा पाएं, यही है विधि-विधान रे,
माँ से बड़ा कोई न जग में, यही चारों धाम रे।।








