
यह आलेख नेपाल के पोखरा से मुक्तिनाथ तक की आध्यात्मिक और प्राकृतिक यात्रा का वर्णन करता है, जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक समन्वय का अद्भुत संगम दिखाई देता है। यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं बल्कि आत्मिक शांति और मोक्ष की खोज का प्रतीक है।
- पोखरा की वादियों से मुक्तिनाथ का मोक्ष मार्ग
- हिमालय की गोद में आस्था और प्रकृति का संगम
- शालिग्राम, काली गंडकी और मुक्तिनाथ का आध्यात्मिक रहस्य
- नेपाल की पवित्र यात्रा: सौंदर्य से मोक्ष तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
नेपाल, जिसे दुनिया केवल एवरेस्ट के देश के रूप में जानती है, वास्तव में वह उससे कहीं अधिक गहरा और आध्यात्मिक है। यह वह भूमि है जहाँ पत्थर भी बोले जाते हैं और जहाँ बहती नदियाँ मोक्ष की गाथाएँ सुनाती हैं। हमारी यह यात्रा दो विपरीत ध्रुवों के मिलन की कहानी है—एक ओर ‘पोखरा’ है, जो अपनी विलासिता और प्राकृतिक शांति के लिए आधुनिक युग का स्वर्ग है, और दूसरी ओर ‘मुक्तिनाथ’ है, जो 3,800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित वह प्राचीन सत्य है जिसे पाने के लिए ऋषि-मुनियों ने सदियों तक प्रतीक्षा की। पोखरा केवल एक शहर नहीं, बल्कि एक अहसास है। ऐतिहासिक रूप से, यह पुराने भारत-चीन व्यापार मार्ग का एक मुख्य पड़ाव रहा है। 17वीं शताब्दी में, जब नेपाल छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था, पोखरा ‘चौबीसे’ राज्यों में से एक, ‘कास्की’ राज्य का हिस्सा था। आज भी शहर के पुराने हिस्सों में उस काल की वास्तुकला की झलक मिलती है।
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फेवा ताल: जहाँ आकाश जल में उतरता है। पोखरा पहुँचते ही जो पहली छवि मन पर अंकित होती है, वह है फेवा झील। सुबह की पहली किरण जब माछापुछरे (Fishtail) पर्वत की चोटी को चूमती है, तो वह स्वर्ण-शिखर झील के शांत पानी में ऐसे दिखाई देता है मानो साक्षात् महादेव ने जल-समाधि ले रखी हो। ताल बाराही: झील के मध्य स्थित यह द्वि-तलीय पगोडा शैली का मंदिर माँ शक्ति को समर्पित है। यहाँ पहुँचने का एकमात्र जरिया ‘डूंगा’ (रंगीन नावें) है। लहरों के बीच से गुजरते हुए मंदिर तक पहुँचना, संसार के कोलाहल से भक्ति की शांति की ओर बढ़ने जैसा है। डेविस फॉल्स और गुप्तेश्वर: पाताल के रहस्य हैं। पोखरा की भौगोलिक बनावट विस्मयकारी है। डेविस फॉल्स (Patale Chhango) का पानी जब एक अंधेरी खाई में गिरकर गायब होता है, तो वह प्रकृति की विनाशकारी और सृजनात्मक शक्ति का अहसास कराता है। इस झरने के ठीक सामने गुप्तेश्वर महादेव गुफा है। गुफा की गहराई में उतरते हुए ऐसा लगता है मानो हम धरती के गर्भ में प्रवेश कर रहे हैं। यहाँ का प्राकृतिक शिवलिंग सदियों से अंधकार में भी प्रकाश की प्रेरणा दे रहा है।
सूर्योदय का दार्शनिक पक्ष: यदि आप जीवन में नई आशा का अर्थ समझना चाहते हैं, तो आपको भोर के समय सारंगकोट की पहाड़ी पर होना चाहिए। यहाँ से अन्नपूर्णा रेंज और धौलागिरी के विशाल शिखरों का जो विस्तार दिखता है, वह मनुष्य के अहंकार को एक पल में समाप्त कर देता है। काली गंडकी का चुनौतीपूर्ण मार्ग – शालिग्राम की खोज में। पोखरा की सुखद जलवायु को छोड़कर जब हम मुक्तिनाथ की ओर बढ़ते हैं, तो रास्ता रोमांच और भक्ति की पराकाष्ठा बन जाता है। जोमसोम तक की यात्रा में हिमालय का वह रूप दिखता है जो कठोर है, शुष्क है, लेकिन अत्यंत तेजस्वी है। विश्व की सबसे गहरी घाटी और काली गंडकी: मुक्तिनाथ जाने के मार्ग में हम उस स्थान से गुजरते हैं जिसे ‘अंधा गल्छी’ कहा जाता है। यह दुनिया की सबसे गहरी खाई है। इसके किनारे बहती काली गंडकी नदी का अपना एक अलग शास्त्र है।
शालिग्राम शिला: यह दुनिया की एकमात्र नदी है जहाँ ‘शालिग्राम’ पत्थर मिलते हैं। ये पत्थर वास्तव में करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (Fossils) हैं, जिन्हें हिंदू धर्म में भगवान विष्णु का साक्षात् विग्रह माना जाता है। इन काले, चिकने पत्थरों को नदी के तट पर खोजना अपने आप में एक आध्यात्मिक खोज जैसा है। 3,800 मीटर की ऊँचाई पर स्थित मुक्तिनाथ (मुस्तांग) वह स्थान है जहाँ पहुँचकर समय थम जाता है। इसे ‘मुक्ति क्षेत्र’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘वह स्थान जहाँ मोक्ष प्राप्त होता है’। मंदिर परिसर के पीछे अर्धवृत्ताकार रूप में 108 काँसे के गौमुखों से पवित्र जल की धाराएँ गिरती हैं। 108 का अंक हिंदू ज्योतिष और बौद्ध परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। शून्य से भी कम तापमान में जब यात्री इन 108 धाराओं के नीचे से दौड़ता है, तो उसका शरीर भले ही काँप रहा हो, लेकिन उसका मन एक असीम शांति से भर जाता है। माना जाता है कि ये धाराएँ मनुष्य के संचित पापों का क्षरण कर देती हैं।
मुक्तिनाथ मंदिर के पास ही स्थित ज्वाला माई का मंदिर एक प्राकृतिक चमत्कार है। यहाँ भूमि के भीतर से निकलती एक शाश्वत नीली लौ जलती रहती है। इसके ठीक नीचे से शीतल जल बहता है। अग्नि और जल का यह सह-अस्तित्व दार्शनिक रूप से यह बताता है कि विपरीत स्वभाव के तत्व भी एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं। मुक्तिनाथ की सबसे सुंदर बात यहाँ की साझा संस्कृति है। यहाँ बौद्ध भिक्षुणियाँ (Anis) और हिंदू पुजारी एक साथ मंदिर की सेवा करते हैं। बौद्ध इसे ‘चुमिग ग्यात्सा’ कहते हैं। यह स्थान विश्व को सांप्रदायिक सद्भाव का सबसे बड़ा संदेश देता है। मुक्तिनाथ का उल्लेख विष्णु पुराण में विस्तार से मिलता है। यह स्थल 108 दिव्य देशमों में से 105वाँ है। ऐतिहासिक रूप से, थोरोंग ला पर्वत दर्रे की तलहटी में होने के कारण, यह स्थान प्राचीन व्यापारियों और तपस्वियों के लिए एक मुख्य आश्रय स्थल रहा है। यहाँ का ‘वृंदा और विष्णु’ का प्रसंग हमें सिखाता है कि भक्ति में श्राप भी वरदान बन जाता है और स्वयं भगवान को भी प्रकृति के नियमों में शालिग्राम रूप में रहना होता है।
पोखरा और मुक्तिनाथ की यह यात्रा केवल 165 किलोमीटर की दूरी तय करना नहीं है, बल्कि यह अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने की एक यात्रा है। पोखरा ने हमें सिखाया कि सुंदरता कैसे मन को शांत करती है, और मुक्तिनाथ ने सिखाया कि तपस्या कैसे आत्मा को मुक्त करती है। हिमालय की इन वादियों से लौटते समय, एक यात्री अपने साथ केवल तस्वीरें नहीं लाता, बल्कि वह शालिग्राम की तरह एक ऐसा व्यक्तित्व लेकर लौटता है जो बाहर से कठोर लेकिन भीतर से देवत्व को समेटे होता है।







